रविवार, 27 अगस्त 2017

774

1-कृष्णा वर्मा
1
बादल कारे 
अम्बर के नैन भरे 
उछल पड़े धारे
प्रीतम दूर 
प्रिय का चैन डूबा 
टूटे सब्र किनारे।
2
नभ में घन 
छाते हैं जब-जब
गीत मग्न हो जाते 
गा मल्हार
रिझाए सजनिया
प्रिय दूर मुस्काते।   
3
बूँदें झरतीं 
वृक्ष कहें स्वागत 
धन्य होए धरती 
प्यासे चातक 
की, आस तृप्त होती
बदली जब रोती।  
4
बदरी छाई
पहन के पायल 
हवा छनछनाई 
जी तड़पाएं 
गा-गा कर मल्हारें
प्रीत भरी फुहारें।
5
सजीले मेघ
लगा काजल धार
हृदय भर प्यार
चले भिगोने
धरती का आँचल
तन मन निसार।
6
ताके अडोल
काली-काली बदली
लिये पानी के डोल
बरसूँ कि ना 
सोचती दुविधा में
है मिज़ाजन बड़ी

-0-

मंगलवार, 15 अगस्त 2017

773

परमजीत कौर 'रीत'
1
खामोशी कहती है
यादें सावन बन
आँखों से बहती हैं
2
आँगन के फूलों की
याद बहुत आ
नानी-घर झूलों की
3
नभ को तकती नजरें
पाँव धरा पे जो
मंजिल थामे बाहें
4
क्या खोना ,क्या पाना
अपनों के बिन ,जी!
क्या जीना,मर जाना
-0-kaurparamjeet611@gmail.com

-0-

गुरुवार, 27 जुलाई 2017

772

चोका
-डॉ सुधा गुप्ता
 सावन आये
बहना को भेंटने
बादल-साड़ी
बुँदियों का शृंगार
तीज-त्योहार
बहनें करती हैं
भरे मन से
सिंधारा-इंतज़ार
शाखों के झूले
चिड़ियाँ गातीं गीत-
'पिया-रंगीले'
बहना ने भेजा है
मैके सन्देश-
भइया, ज़रूर आना
राखी बँधाना
बनाऊँ पकवान
रोली-अक्षत
आरती का सामान
करूँ तैयार
आस-भरे नयनों
देखा करूँ दुआर!!
-0-
सेदोका
1-डॉ सुधा गुप्ता
1
यत्न से रखीं
तहाकर जो यादें
अतीत के सन्दूक
खोल बैठी जो,
देखा वक़्त-सितम,
सब चकनाचूर!
2.
पावस-साँझ-
उफनती नदिया
गहराता अँधेरा
जाना है पार
नौका कोई घाट
अछोर फैला पाट
3.
जिस आँख में
समाती नहीं बूँद
ढुलकती बाहर
अचरज है
कैसे तो समा गया
तेरा रूप-सागर
4
बरखा रानी
पूरी ठसक साथ
सजी शाही पोशाक
रथ सवार
खस-भीगी पंखी है
हाथ, शोभा अपार
5.
कल  शृंगार
बने गले का हार
भक्त जन निसार
आज निर्माल्य:
उतार फेंके गए
कचरा पड़ा द्वार!
6.
पड़ी बधाई
बंद मुट्ठी थे
जाने क्या-क्या ले
जाने की बेला:
सब कुछ बाँट के
पड़े हाथ पसारे  
-0-
-सुधा गुप्ता
120 बी /2, साकेत, मेरठ.
शिवरात्रि, 21. 07. 17.
-0-
2- 
शशि पाधा
  1
हिरना मन
वन -वन भटका
नित ढूँढे, न पाए  
कस्तूरी -गंध
मन में ही बसती
 फिर क्यों भरमाए
    2
 तारों की टोली
 चली अम्बर -गली
 करती खिलवाड़
आकाश गंगा
मुसकाए-निहारे
बाँटे खीर कटोरे
-0-


शनिवार, 22 जुलाई 2017

771

कृष्णा वर्मा

शब्द कमाल
हिलें ना डुलें पर
चलते ऐसी चाल
बे हथियार
सहज कर देते
जुदा रिश्तों से प्यार।

मरी है शर्म
कैसे करें बयान
सूखा आँख का पानी
ढोएं माँ-बाप
ज़िम्मेदारियों का बोझ
च्चों  की मनमानी।

कैसा ज़माना
बदले हैं अपने
मरे हैं अहसास
पीड़ा ना दर्द
रिश्तों की टूटन क्यों
चुभती नहीं आज।

होंठों पे ताला
घुटा-घुटा जीवन
जीता आज ज़माना
पहचाना भी
लगे अब अंजाना
मन हुआ सयाना।

खोया है कहाँ
ढूँढें दिशा-देश में
अपना बचपन
जिस गली में
फुर्स जैसे  ऊँचे
थे अपने मकान।

-0-

रविवार, 2 जुलाई 2017

770

     पुष्पा मेहरा 
          
     स्याह रात है
    जाग आया है चाँद
    आज ईद का,
    मात्र चाँद ही नहीं
    संदेशा है ये
    प्रेम-भाईचारे का ,
    रोशनी मात्र !
    प्रात और रात का
    हरती तम
    पर कटार
    ज्ञान की सदा ही
    काटे जड़त्व,     
    यह मन हमारा
    है तानाशाह
    सुनता और करता
    सदा मन की ,
         भेद नीति अपना
    गाड़े स्तम्भ
    अपनी नीतियों के
    चले कुचालें
    जाल धर्मान्धता का
    बिछा कर ये 
    छलता जनता को
    प्रेम-दिखावा 
    पानी में परछाईं
    बना छलता
    गले लगाने बढ़ो
    तो फिसलता         
    पर अबकी चाँद
    अंधकार में
    उजाला साथ लाया 
    देगा खुशियाँ
    तोड़ देगा दीवार
    नफरत की
    मिलेंगे गले सब
    तोड़-खंजर,
    चाँद -सा होगा मन
    हर पल रोशन        

          -0-