सोमवार, 31 अक्तूबर 2011

भूली पहचान


डॉ0 भावना कुँअर
1.
गुमसुम है
गा न पाए कोयल
मीठी -सी तान
सदमें में शायद
है भूली पहचान
2.
देख रही थी
सहमी हुई मृगी
मूक -सी बनी
जाल के चारों ओर
बेरहम शिकारी
3.
दो कबूतर
आकर बैठ जाते
रोज सवेरे
बीती रात की फिर
हैं कहानी सुनाते
4.
चोंच मिलाते
फिर आँख चुराते
कभी कान में
कुछ बुदबुदाते
कभी सकपकाते
5.
बनाए गर
मक्खन के पुतले
पिंघलेंगे ही
जब भी वो पायेंगे
सूरज की तपन
6.
ढूँढे दिल भी
ढूँढते हैं नयन
तुझे सजन
क्योंकर लगी मुझे
ये प्रीत की लगन
7.
मेरा ये मन
हो बन में हिरण
बिन तुम्हारे
या फिर जैसे कोई
पगली -सी पवन
8.
आकर गिरे
अलकों से टूटके
दो सच्चे मोती
मन की माला में,मैं
हूँ भावों से पिरोती

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8 टिप्‍पणियां:

Dr.Bhawna ने कहा…

चित्रों से ताँका की खूबसूरती उभर आई है... स्थान देने के लिये आभार काम्बोज जी...

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
सूचनार्थ!

दिलबागसिंह विर्क ने कहा…

मेरा ये मन
हो बन में हिरण
बिन तुम्हारे
या फिर जैसे कोई
पगली -सी पवन

बहुत खूब

satishrajpushkarana ने कहा…

इन सुन्दर और मर्मस्पर्शी भाषा से विभूषित ताँका के लिए भावना जी को बधाई! ऐसी रचनाओं से ही साहित्य की श्रीवृद्धि होती है । प्रस्तुति के लिए डॉ हरदीप जी और भाई काम्बोज जी का श्रम भी सराहनीय है।

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

आकर गिरे
अलकों से टूटके
दो सच्चे मोती
मन की माला में,मैं
हूँ भावों से पिरोती

बहुत सुन्दर ...

amrendra "amar" ने कहा…

वाह कोमल भावो को बहुत सुन्दरता से अभिव्यक्त किया है।

amita kaundal ने कहा…

ढूँढे दिल भी
ढूँढते हैं नयन
तुझे सजन
क्योंकर लगी मुझे
ये प्रीत की लगन
sabhi tanka bahut sunder hain par yeh man ko choo gaya.
badhai.
amita kaundal

Rama ने कहा…

बनाए गर
मक्खन के पुतले
पिंघलेंगे ही
जब भी वो पायेंगे
सूरज की तपन
सभी तांका अच्छे हैं.पर यह मन को छू गया ..बहुत-बहुत बधाई ...
डा. रमा द्विवेदी