बुधवार, 1 अगस्त 2018

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ताँका 
डॉ.कविता  भट्ट






































कृष्णा वर्मा   
1
तरसा मन
करूँ तुमसे बातें
रूठा क्यूँ रिश्ता
दहके दिन मेरे
जलती रहीं रातें।
2
दे देते यदि
अँजुरी भर प्यार
जी लेते हम
पतझर ऋतु में
बनकर बहार।
3
सिर्फ अपना
प्यार तो समर्पण
ढूँढे क्यों ख़ता
बन जा तू क़ाबिल
बेकार ना आज़मा।
4
यूँ ना तड़पा
और चुप रहके
न पीड़ा बढ़ा
कह ग़म अपने
हर लूँ मैं अँधेरे।
5
हुआ बेरंग
जीवन बिन तेरे
टूटी है आस
पनघट पे बैठी
रही प्यासी ही प्यास।
6
इतनी  चाह-
फूलें -फलें संबंध
सच्ची हो वफ़ा
आए नहीं दरार
पलता रहे प्यार।
7
तुम क्या मिले
बने शूल राहों के
फूलों के गुंचे
राहें हुईं आसान
सुख मेहरबान।
-०-



9 टिप्‍पणियां:

ज्योति-कलश ने कहा…

सुन्दर प्रस्तुति !
दोनों रचनाकारों को हार्दिक बधाई !!

अनिता मंडा ने कहा…

कविता जी छवि के साथ सुंदर ताँका।
कृष्णा जी उम्दा भाव ।
बधाई।

डॉ. जेन्नी शबनम ने कहा…

बहुत सुन्दर रचनाएँ. चित्र पर अंकित ताँका बहुत अच्छा लगा. दोनों रचनाकारों को हार्दिक बधाई.

Shashi Padha ने कहा…

अरे वाह! दोनों रचनाएँ उत्कृष्ट | बधाई स्वीकारें |

Sudershan Ratnakar ने कहा…

सुंदर सृजन।कविता जी, कृष्णा जीबधाई

Dr.Bhawna ने कहा…

Sundar prstuti donon rachnakaron ko hardik badhai

Jyotsana pradeep ने कहा…

बहुत बढ़िया प्रस्तुति !
आप दोनों रचनाकारों को हार्दिक बधाई!!

प्रियंका गुप्ता ने कहा…

बेहतरीन

Anita Lalit (अनिता ललित ) ने कहा…

मन को छू गए सभी ताँका कविता जी व कृष्णा दीदी !

दे देते यदि
अँजुरी भर प्यार
जी लेते हम
पतझर ऋतु में
बनकर बहार। ~ और जीवन में क्या चाहिए!

~सादर
अनिता ललित