सोमवार, 15 सितंबर 2014

शब्द खोखले…



1- चोका

डॉ सुधा गुप्ता



शब्द खोखले

हो चुके अर्थहीन

नहीं करते सम्प्रेषित कुछ भी
बेमानी हुए
धन्यवाद, आभार
केवल एक
औपचारिकता है
यान्त्रिक बना
कृतज्ञता ज्ञापन
अर्थ खो बैठे
इतना इस्तेमाल
हुए बेचारे !
लुंज-पुंज हुए हैं
विवश पड़े हैं
टकटकी लगाए
एक ही आस:
कि कोई उन्हें अब
मुक्ति दिलादे !
सो उन्हें मुक्त कर
हो ख़ाली हाथ
आ गई  शब्दहीन
तुम्हारे पास
केवल अनुभूति
आन्तरिक, तुम्हें
सदा निवेदित ,जो
सहचरी है
नि:शन्द मौन  की ही !
पास मेरे तो
न फूल हैं , न पत्ते
नहीं है जल
निष्फल कामनाएँ
कहाँ हैं फल ?
अब तुम ही कहो
भेंट क्या करूँ ?
करो यदि स्वीकार
समर्पित है
अनन्य भावावेग
निर्मल उपहार
-0-
2-ताँका



डॉ० सुरेन्द्र वर्मा
1
बर्फ का ठंडा
टुकड़ा ही क्यों न हो
शांत निर्लिप्त
मानवी स्पर्श पा के
पिघल ही जाता है।
2
हमारा मन
भावनाओं से भरा
बोल न पाया
डर था,खालीपन
घर न कर जाए।
3
हरी घास पर
बारिश की ये बूँदें
तेरी आँखों में
झिलमिलाती खुशी
और उसकी चमक ।
4                               
ढूँढ़ता रहा
सारी रात तुमको
चाँद आया था
लेकर उजियारा
उसी की रोशनी में
5
खामोश रात
है नहीं खड़कता
एक भी पत्ता
झींगुर की आवाज़
बस तोड़ती मौन
6
नीम उजाला
और गहराने दो
टटोल सकूँ
ताकि देह-लय को
रहती अदृश्य जो
-0-

मंगलवार, 9 सितंबर 2014

नैनों में सपने हैं

डॉ ज्यो त्स्ना शर्मा
 1
मिलने की आस बँधी
झूम उठी बगिया
फूलों से खूब लदी ।
2
क्यों नैन भिगोती है
बंद सदा रखना
मुट्ठी में मोती है
3
ढूँढो तो राह मिले
स्नेह सहित सींचो
खुशियों के फूल खिलें ।
4
वादे से मुकर गए
ख्वाब बहारों के
पलकों पे गुजर गए ।
5
नैनों में सपने हैं
दुर्दिन कह जाएँ -
कब?कितने?अपने हैं ।
6
दीं चोटें फूलों ने
बींध दिया मनवा
सुधियों के शूलों ने ।
7
कुछ बढ़कर अटक गए
यश पाया थोड़ा
फूले,पथ भटक गए ।
8
अनुभव ने सिखलाया
चन्दन थे, जग ने
 विषधर बन दिखलाया।
9
काँटों में कलियाँ हैं
बिटिया की बतियाँ
मिसरी की डलियाँ है ।
10
जग जान कहाँ पाया
मर्यादा भूला
मन मान कहाँ पाया ।
11
किस्से दिन -रातों के
संग खिलौने हैं
मीठी सी बातों के ।
12
रुत आनी -जानी है
सुख-दुख साथ चलें
ये रीत पुरानी है ।
13
क्या दी क़ुव्वत मुझमें
बाँट दिया रब ने
माँ ! बिटिया में , तुझमें।
 -0-




सोमवार, 8 सितंबर 2014

शुभ -सौन्दर्य

1-चोका
 ज्योत्स्ना प्रदीप

        ध्वनि शंख-सी
        आँखें मोर -पंख -सी
        एक छवि की !
        कल्पना हो कवि की,
        शुभ -सौन्दर्य
        मूक चित्रकार का ।
        आकार लिये,
        उस निराकार का ।
        सुशोभित हो
        पीत -परिधान में
        मुस्कान मानो
        मोती भरा-कटोरा
        फैला ब्राह्माण्ड
        हुँ ओर उजले
        गीता का ज्ञान
        तेरी- बाँसुरी स्वर !
        या शंख- नाद
        है समीर समेटे
        आज भी कही
        एक गोपी ढूँती
        वह विटप
        जिसके तले कान्हा
        गैया के पास
        आज भी अधलेटे
        सुने जो सुर
        अनादि -वंशी -तान
        असीम -भाग्यवान
      -0-
2- माहिया
डॉ सरस्वती माथुर
1
 तुमको जब से खोया
 मनवा जाने क्यों   
 बादल बनकर रोया l
2
मन की जब नाव चली
पुरवा -सी  यादें 
साजन  के गाँव चली l
3
चुपके-चुपके आया
चंदा बन मन में
मेरा साजन छाया l
4
नैना तोसे   लागे
साजन की खातिर
हम रातों  को  जागे l
-0-



सोमवार, 1 सितंबर 2014

भाव-धारा



1-माहिया
शशि पाधा
1
रुकती ना पहरों में
नदियाँ  जा मिलती
सागर की लहरों में ।
2
पंछी तो जाने ना
सीमा देशों की
नभ से पहचाने ना ।
3
पर्वत की धारा है
पत्थर राह मिले
मन किसने हारा है ।
4
निज पौरुष आँक  लिया
मेघों ने ढाँपा
सूरज ने झाँक लिया ।
5
पथ -पथ में नूर भरे
नन्हा जुगनू भी
अँधियारा दूर करे ।
6
पुरवा ले आती है
खुशबू  चंदन की
कण-कण महकाती है ।
7
सुख- दिन की आस करो
अपने हाथों पर
कुछ तो विश्वास करो ।
8
इच्छाएँ  सपनों सी
पूरी हों न हों
संग रहती अपनों सी ।
9
इन मौन इशारों ने
दरिया बाँध लिये 
दो शान्त किनारों ने ।
10
हाथों की रेखा है
बनती - मिटती है
कर्मों का लेखा है ।
11
कुछ और न कहना है
उमड़े भावों की
धारा में बहना है
-0-
2-ताँका
सविता अग्रवाल "सवि"
1
नीला अम्बर
खुशनुमा मौसम
बहारों  संग
उड़ कर चली वो
भरने नव रंग ।
2
शाखाएं  झुकी
करने को नमन
पत्ते भी हिले
देने सलामी स्वयं
हवा के झोंकों संग
3
ऊँचा पहाड़
मंदिर की घंटियाँ
अनोखी छटा
पथ हुए बीहड़
पर मन है दृढ़ ।
4
गंतव्य दूर
अनजानी- सी राहें
रात अँधेरी
चिराग की रोशनी
दिशाओं का संकेत ।
5
महानगर
भीड़ ही भीड़ यहाँ
भागते सभी
रास्ते में भीड़ भारी
समय न है यहाँ ।
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