1- चोका
डॉ सुधा गुप्ता
शब्द खोखले
हो चुके अर्थहीन
नहीं करते सम्प्रेषित कुछ भी
बेमानी हुए
‘धन्यवाद’, ‘आभार’
केवल एक
औपचारिकता है
यान्त्रिक बना
‘कृतज्ञता – ज्ञापन’
अर्थ खो बैठे
इतना इस्तेमाल
हुए बेचारे !
लुंज-पुंज हुए हैं
विवश पड़े हैं
टकटकी लगाए
एक ही आस:
कि कोई उन्हें अब
‘मुक्ति’ दिलादे
!
सो उन्हें मुक्त कर
हो ख़ाली हाथ
आ गई शब्दहीन
तुम्हारे पास
केवल ‘अनुभूति’
आन्तरिक, तुम्हें
सदा निवेदित ,जो
सहचरी है
नि:शन्द मौन की ही !
पास मेरे तो
न फूल हैं , न पत्ते
नहीं है जल
‘निष्फल’ कामनाएँ
कहाँ हैं फल ?
अब तुम ही कहो
भेंट क्या करूँ ?
करो यदि स्वीकार
समर्पित है
‘अनन्य’ भावावेग
निर्मल उपहार…
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2-ताँका
डॉ० सुरेन्द्र वर्मा
1
बर्फ का ठंडा
टुकड़ा ही क्यों न हो
शांत निर्लिप्त
मानवी स्पर्श पा के
पिघल ही जाता है।
2
हमारा मन
भावनाओं से भरा
बोल न पाया
डर था,खालीपन
घर न कर जाए।
3
हरी घास पर
बारिश की ये बूँदें
तेरी आँखों में
झिलमिलाती खुशी
और उसकी चमक ।
4
ढूँढ़ता रहा
सारी रात तुमको
चाँद आया था
लेकर उजियारा
उसी की रोशनी में
5
खामोश रात
है नहीं खड़कता
एक भी पत्ता
झींगुर की आवाज़
बस तोड़ती मौन
6
नीम उजाला
और गहराने दो
टटोल सकूँ
ताकि देह-लय को
रहती अदृश्य जो
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