बुधवार, 8 अक्टूबर 2014

मन की झील


डॉ०भावना कुँअर

1

चाहूँ मैं जाना

एक अजनबी से

अन्जान सफ़र पे

रोकते हो क्यूँ

हर बार ही मुझे

बढ़ा हाथ अपना।

2

सँभाले रही

घुटन की चादर

जाने कहाँ उघरी

निकल भागी

आँसुओं में लिपटी

जा मीत- गले लगी।

3

सर्द रातों में

गरम चादर -सी

लिपटी क्यों रहती?

अतीत की ये

घनी परछायाँ

देती रुसवायाँ।

4

घोलें मिस्री -सी ,

कभी कड़ुवाहट,

बीते हुए कल की;

परछायाँ

खिली ,कभी बिखरी

जैसे अमरायाँ।

5

नन्हीं कलियाँ

खिलने को आतुर

छोड़ती जाएँ पीछे

बचपन की 

यूँ यादों में लिपटी

ढेरों परछायाँ।

6

तेरी थी छाया

छोड़ अँगना चली

सिसकियों में गूँजी,

मैके की गली

अरमानों से लदी

डोली निकल पड़ी।


छाया: रामेश्वर काम्बोज
7
लहर आती

किनारों के कान में

कहकर है जाती

न जाने क्या-क्या

चुपके -से ,हौले -से

 सबसे है  छिपाती।

8

किरणें आज

सागर के तन को

खूब गुदगुदाएँ


सूर्य बुलाए

मंद-मंद मुस्काएँ

वापस ही न जाएँ।

9

मन की झील

शान्त थी बरसों से

कौन पथिक आया !

फेंक इसमें

प्रेम-काँकर ,भागा

हाथ ही न आ पाया।

शनिवार, 4 अक्टूबर 2014

निर्मलता



1-अनिता ललित
1
निर्मल मन
मनुष्य का गहना;
जिसने भी पहना
जीता जग से;
चुभते काँटों को भी
फूल  जैसा ही जाना।
2
बहती जब
निर्मल मधु-धार
प्रेम-रस फुहार
दिलों के बीच,
मिटते सारे द्वेष
खिलते नेह-फूल।
-0-
2- ऋता शेखर 'मधु'
1
निशा को तोड़े
निर्मल चन्द्र-रश्मि
शीतलता को जोड़े
निश्छल सूर्य
चले निशा- दिवस
करे जग कल्याण।
2
निर्मल मन
दया का भाव रचे
रब ने भेजा तुम्हें
कैसा है स्वार्थ
निश्छलता क्यूँ खोई
मानवता है रोई।
3
ओ रे कपोत
शांति का दूत बना
कहाँ तू विचरता?
निर्मम जग
समझ पाएगा क्या
तुम्हारी निर्मलता।
4
नारी हो तुम
गंगा -सी पावन हो
भादो या सावन हो,
बनो कठोर
रावण से ना हारो
हाथों में शूल धारो।
-0-
मंजु गुप्ता
1
उर में ज्योत
जले निर्मलता की
भागे व्यर्थ विकार
छादिव्यता
विधायक भावों की
मानवीय मूल्यों की ।
2
जल - थल को
बनाए देवामृत
फूटें जन - मन  में 
सत्य - श्रम से
स्वच्छता की धाराएँ
नीरोगी रहें जग 

गुरुवार, 2 अक्टूबर 2014

रौशनी की किरण




 डॉ हरदीप कौर सन्धु

सर्द दिन…… थर-थर काँपती धूप  ....... मगर गुलाबी धूप के टुकड़ों को उसकी मीठी दोस्ती -संग निभाते मेरा अन्तर्मन असीम ख़ुशी से भर जाता। उससे जुड़ी दिली साँझ मुझे ख़ूनी रिश्तों से भी अनमोल लगती।  वह अक्सर दूधिया हँसी हँसती मुझे चाव से मिलती। आज किसी अलौकिक प्रसन्ता के उल्लास से भरकार  उसने कहा, " जल्दी ही एक नन्हा फ़रिश्ता मेरी झोली में आने वाला है।" उसी पल स्वाभाविक रूप से मेरा निजी अनुभव बोला," तेरा खिला माथा  तथा चेहरे का नूर तेरी कोख में पलने वाली नन्ही परी के आने की हामी भरता है। "

           छन-छन करता समय अपनी चाल चलता रहा और नन्हे फ़रिश्ते का अपनी माँ की कोख का गुलाबी सफर अब अन्तिम पड़ाव पर है। गुनगुनी  फागुनी धूप ,आज फिर हमारी मुलाकात हुई।  कुछ महीने पहले अनुमानित बात पर उसने पक्की मोहर लगाते हुए कहा, " सच हाँ  सच में ………… एक नन्ही परी हमारे घर आने वाली है !" नई टैक्नॉलोजी के ज़माने में सब कुछ पहले से ही मालूम हो जाता है।

              आज ऐसे लगा जैसे उसके मन के मौसम में फूलों जैसी रस -भीनी महक बिखर गई हो। बहार जैसे खिलते हुए किसी अलौकिक उमंग में भरते हुए  उसने बड़े चाव से अपनी सुंदर परी के स्वागत की पहले से की हुई तैयारी को मेरे सामने लाकर बिखेर दिया। कहीं स्वयं खरीदी छोटी -छोटी गुलाबी फ्रॉक तथा मौजे तो कहीं सात समंदर पार से ऊनी धागों में बुना हुआ भेजा दादी -नानी का मोह-भीगे बचकन्ने। अपने पति की लाई हुई प्यारी सी गुड़िया जब उसने मुझे दिखाई तो लगा जैसे सच में ही दूधिया हँसी से आँगन भर गया हो। शायद वो इस गुड़िया को देखकर अपनी लाडो का चेहरा प्रतिदिन अन्तर्मन में देखती  है।

            ……… आने वाली रौशनी की किरण जैसी परी को मन ही मन में आज भागभरी कहने को मेरा मन कर आया।



खुली खिड़की

रौशनी की किरण

देखूँ आँगन।       

       
-0-