डॉ०भावना कुँअर
1-माहिया
जब फूल लगे सोने
नटखट ओस चली
भर मोती के दोने ।
2
रातों दिल काँपा था
कोमल कलियों ने
जब डर को भाँपा था ।
3
रजनी सोने जाए
ये नटखट चन्दा
जा,हर बार जगाए
4
रीत गया जब सागर
डोलूँ यहाँ- वहाँ
ले प्रेम -भरी गागर।
5
रह –रह मीत पुकारे
भँवरों में नैया
ओझल आज किनारे ।
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2- चोका
नटखट तितली ( चोका)
काश मैं होती
नटखट तितली
उड़ती जाती
दूर गगन,वन
या उपवन।
रंग -बिरंगे पंख
लहराती यूँ
हवा गुनगुनाती,
कली मुझसे
खूब ही बतियाती,
फूलों से यारी
लगती मुझे प्यारी,
बंधन- मुक्त
मैं जहाँ चाहे जाती,
कोई भी बेड़ी
मुझे न बाँध पाती,
न कोई रिश्ता
छल ही कर पाता,
न रूढ़ियों का
बंधन कस पाता,
शक्की निगाहें
न मर्म ही बेंधती,
कोख में माँ की
यूँ उजाड़ी न जाती,
‘बेटी है ये तो
जाना पराये घर’
सीख न पाती।
न दहेज -आग में
झोंकी ही जाती।
होती न तार-तार
इज्जत से मैं।
पाती न तिरस्कार।
कभी निर्बल,
कभी अबला नारी,
कभी बेचारी
अरे !लड़की ये तो,
ऐसे ओछे से
परस्कारों से मैं ना
यूँ नवाजी ही जाती।
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