अनिता मंडा
1
हरसिंगार
हर शाम सँवरे
भोर बिखरे
बाँटने को ख़ुशबू
बूँद-बूँद से झरे।
2
रूह को मेरी
अब करार आया
मिली रौशनी
इबादत- किराया
हर पल चुकाया।
3
कैसे दिखते
हमको ये सितारे
इतने प्यारे
जो राह में तुम यूँ
न बिछाते अँधेरे ।
-0-
1-हरकीरत हीर
1
कैसी ये प्रीत
हुई
नींद हुई बैरन
कटती ना रात
मुई।
2
कैसे ये पीर
सहें
तुझ बिन अब
प्रीतम
अखियों से नीर
बहे ।
3
ज़ख्मों के छाले
हैं
बरसों से दिल
में
यादों को पाले
हैं ।
4
कैसा ये रोग लगा
हीर हुई जोगन
इक तू ही मीत सगा।
5
इश्क़ -पगा धागा था
तोड़ दिया तूने
कुछ और न माँगा
था।
6
मन के ना फूल खिले
प्रीत वहीं
खिलती
दिल भी जिस ठौर मिले ।
7
लिख दे वो गीत
पिया
रूठ गई नज़्में
जब से तू मीत
गया ।
8
कैसी सौग़ात मिली
अश्क़ रहे पीते
दर्द भरी रात
ढली
9
तू भी मुझ संग
जगे
आ रे ,ओ चन्दा
तुझ से ही नेह
लगे ।
10
तूफ़ाँ ले आते
हैं
आँखों के आँसू
जो बह ना पाते
हैं ।
11
साँसें अहसान बनीं
जब से तुम रूठे
खुशियाँ अनजान बनीं
।
-0-
ज्योत्स्ना प्रदीप
देखो तो तुम्हें
 |
| फो्टो: गूगल से साभार |
वक्त ने कैसा छला
!
तेरा वो रूप ,
धुँधला -सा हो
चला ।
पहले तेरे
अधरों से बही थी -
प्रेम की धार
वो मादक बहार
था भोला रूप
मानों शिशिर -धूप -
जानें किधर
भेस बदलकर ,
वो पल गए।
तुम बदल गए!
अब तो तेरी
आँखों की बाँबियों
से
शिकायतों के
सर्प निकलते हैं
मेरी आँखों में
भय भर जातें हैं
क्यों ये विचित्र
मनोदशा बना ली
जब तू बना
विषधर -सा कभी
क्यों बनी थी मै
वो चन्दन की डाली
पीड़ा- यही है खाली
-0-
डॉ•हरदीप सन्धु
1
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| ( चित्र:गूगल से साभार) |
खोए रिश्ते मिलते
सूखे बागों में
पाटल मन के खिलते
2
हम जिस भी ओर चले
पथरीली राहें,
काँटों के छोर मिले।
3
रिमझिम बरसा पानी
नैनों की नदिया
कहती करुण कहानी।
4
कलकल बहती धारा
निर्मल जल -जैसा
पावन साथ तुम्हारा ।
5
मौसम सब प्यारे हैं
माही जब मिलता
तब जश्न, बहारे हैं ।
6
तुम धीरे से बोलो
मन की गगरी में
रस भावों का घोलो ।
-0-