शुक्रवार, 18 मई 2018

808

1
कुछ खिलौने
उम्र छीन ले गई
कुछ वक़्त  ने लूटे,
ख़ाली हाथ हूँ
काश ! कोई लहर
हथेली भर जाए !

आज आदरणीया डॉ. सुधा गुप्ता जी का जन्म दिन है , इस अवसर पर हाइकु की शोध छात्रा  पूर्वा शर्मा का पत्र ,तथा अन्य रचनाएँ दी जा रही हैं. 
 पूज्या सुधा गुप्ता  जी को शत -शत नमन !
( सम्पादक एवं सभी रचनाकार )
-०-
आदरणीया सुधा जी,
प्रणाम !
 आपको जन्म दिन के लिए बहुत-बहुत बधाई हम सब के लिए बहुत ही ख़ुशी का अवसर है कि आपने अपने जीवन के 84 वर्ष पूर्ण कर लिये  और आज भी आपका साहित्य-सृजन निरंतर गतिमान है ‘हाइकु’ शब्द के साथ ही आपका नाम अपने आप जिह्वा पर आ जाता है  मैं ये दावे के साथ कह सकती हूँ कि शायद ही कोई ऐसा हाइकु रसिक होगा ,जो आपकी रचनाओं से प्रभावित न हुआ हो  आपके साथ बिताया प्रत्येक पल मेरे जीवन का अविस्मरणीय पल है, जिसे कैमरे में कैद करने की आवश्यकता नहीं है, यह सभी स्वर्णिम  पल मेरी आँखों में सदा के लिए बस चुके हैं  बस यही कामना  करते हैं आप नीरोग रहे और आपकी रचनाओं का स्वाद लेने का सौभाग्य हमें प्राप्त होता रहे  हम सभी हाइकु प्रेमियों की ओर से आपको बहुत-बहुत बधाई 
हाइकु वर्षा
अनवरत बरसे
सुधा-कलम से
-पूर्वा शर्मा 
-०-
1-मन बावरा 
-सत्या शर्मा ' कीर्ति '

उबड़ -खाबड़ , चढ़ाई से भरे रास्ते  और कहीं-कहीं दिखते पत्थरों से बने खूबसूरत से मकान
, जिनके आस -पास हसीन से  लोग जानी पहचानी सी मुस्कान लिए यूँ अपनापन दे रहे थे जैसे शायद उन्हें पता हो मै आऊँगी एक दिन ,जैसे कि नियति ने पहले ही सब व्यवस्था कर रखी हो ।
फिर हल्की सी बारिश और पेड़ों , फूलों , पत्तों से निकली मिली- जुली मीठी -सी खुशबु जैसे अंदर तक अमृत घोल गयी ।शुद्ध हवा कितना कुछ दे जाती है न जैसे कुछ भरता ही जाता है  अंदर ही अंदर ।पास ही सर्पिली सी नदी बलखाती- सी नीचे उतर रही थी और मेरा चढ़ना देख ,हँसकर  कह रही थी जाओ न अलकनन्दा तुम्हे ही याद कर रही है । मन जैसे और भी पुलकित हो उठा ।
तभी कहीं से किसी वाद्य यंत्र की आवाज सुनाई दी ।
जाने कहाँ से हवा संग तैरती - ढूँढ़ती हुई आ मिली मुझेसे ।मैंने भी कानों से सुन मन में बसा लिया पर जाने क्यों आँखों से टपक नदी संग बह गयी ।
कितना अजीब है न जहाँ हम किसी को नहीं जानते पर उस जगह को भी इन्तजार सा रहता है हमारा । हाँ , तभी तो मैं अपने सम्पूर्ण बजूद के साथ समाती जा रही थी और लग रहा था जैस एक जगह कब से खाली रखा था इन खूबसूरत वादियों ने शायद मेरे लिए ।
क्या सब कुछ निश्चित होता है ?
शायद इसीलिए पास से गुजरती हुई हवा ने हल्के से छू कर कहा "थकी तो नहीं "और आस - पास के पेड़ों को जोर से हिला अनगिनत रंग - बिरंगे फूलों को मुझ पर बरसा कहा " आओ स्वागत है तुम्हारा ।"
हाँ , कुछ जगहें भी इन्तजार करती है हमारे आने का ।
0
देखता द्वार
करता इन्तजार
मन बावरा ।।

0
उठे है हूक
पिया परदे
सी
कब
 आएँगे।।

-0-
2-दर्द  पेड़ों का
 -कमला घटाऔरा

आज मन बड़ा उत्साह से भरा था ।गगन में रह रह कर बादल अठखेलियाँ कर रहे थे । धूप  चंचल शिशु की तरह हमारी कार की खिड़की से हमारा स्पर्श कर  दूर भाग जाती। कभी जंगल की         ओर जाने वाले ऊँचे -ऊँचे पेड़ों के पीछे जाकर लुका-छिपी का खेल खेलती कभी फिर सामने आ जाती ।हमारा बचपन जगा रही थी । जी करता अभी कार से निकल हम भी पेड़ों के पीछे छुप जायें उसके दिखते ही उसे पकड़ लें । लेकिन शीतल हवा का स्पर्श तन में कंपन भर रहा था ।यहाँ इस देश में धूप होने पर भी ठंड ही रहती है ।
हम एक नए खरीदे घर को देखने जा रहे थे उसके मालिक के साथ । कार अपनी रफ्तार से आगे बढ़ रही थी ।अब हम फोरेस्ट रोड़ से आगे जा रहे थे । ऐसा प्रतीत हुआ जैसे सड़क के दोनों ओर  ऊँचे - ऊँचे घने वृक्षों की कतारें आने वालों के स्वागत में खड़ी हों ,नवीन हरित वस्त्र धारण किये मुस्कुराती हुई ।आगे चल कर गिनती के कुछेक घरों का छोटा सा रिहायशी एरिया आ गया ।कुछ माइल चलने के बाद हमारी मंजिल थी । गेट खोलने के लिये कार से बटन दबाया गया । हमारी कार हमें कई मीटर चलकर अंदर गृह द्वार तक ले गई ।
तीन चार एकड़ की जगह में फैला यह एरिया  चारों ओर दरख्तों से घिरा था ।एक तरह से जंगल के बीच स्थित था । चारों ओर घूम कर अपने पग चिन्ह बनाना मेरे जैसे ढलती उम्र वालों के लिए मुश्किल होता है ।सो चारों ओर घूम कर हर पेड़ से ‘हैलो’ नहीं कह सकी । मैं तो वहाँ पूर्व बाशिंदो के लगाए फूल पौधों ,बेलों और फलों के पेड़ों को ही निहारती रही । मोहित होती रही । पेड़ पौधों के रसिकों का मन ही मन गुण गान करती रही । एक बहुत ही पुराना पेड़ जिसकी जड़ें , इस अर्ध सदी पूर्व बनाए पाँच कमरों के घर की नींव तक पहुँचने जा रही थी ,उन्हें काट दिया गया था ताकि घर को कोई क्षति न पहुँचे ।उसकी लकड़ियों को छोटा- छोटा करके  सूखने के लिये बिखेर दिया गया था , जो सर्दियों में घर गर्म रखने के काम आने वाली थी।
घर के नए मालिक ने इधर उधर बिखरी सूखी पतली टहनियों को भी इकट्ठा करके जलाने के लिए एक पेड़ के नीचे जमा किया हुआ था । जाते ही वह अपने काम में जुट गया । पुराने पेपर ले जाकर लाइटर से आग जला दी । धुँआ छोड़ती लकड़ियाँ जल्दी ही लपटों में बदल गईं । जिस सूखे पेड़ के नीचे सूखी लकड़ियाँ रखकर जलाई जा रही  थीं , उसकी लपटें सूखे पेड़ के शिखर को तो छू ही रही थी, लेकिन जब उन लपटों का सेक आस पास खड़े हरे भरे पेड़ों को भी झुलसाने लगा तो मन
असह्य पीड़ा से भर गया ।लगा जैसे पेड़ दर्द से कराह उठें हों ।मैं न उन्हें सांत्वना  दे सकती थी ना धुएँ को उस ओर जाने से रोक सकती थी ।जो कर सकती थी वह भी न कर सकी । मैं कह सकती थी आप लोगों को इन हरे भरे वृक्षों के पास इस तरह आग नहीं जलानी चाहिये थी । मैं कुछ कहती पहले ही मकान मालिक आग जला चुका था ।कहने का अब कोई फायदा नहीं था ।
जो एक तरफ तो सैंकड़ों नए पेड़ लगाने को यत्नशील है दूसरी ओर आग जलाते समय यह कैसे भूल गया  कि जो पेड़ लहलहा रहें हैं उन की सुरक्षा तो पहले सोच लूँ ।उनसे दूर जा कर आग जलाऊँ । मैं  इस उलझन से घिरी सोचती  रही कि हमारा ध्यान क्यों एक ही  काम पर जुट जाता है ? उसके दूसरे पक्ष को कैसे भूल जाता है ? काश ! उन की आँखें देख पाती जलते पेड़ों के दर्द को , जान पाती  उन में भी जान होती है । उन के दुख से धरा को भी पीड़ा होती 
दर्द पेड़ों  का
जान पाए न कोई
धरा तड़पे ।

-०-

-०-
3-भीग गई वसुधा
डॉ.पूर्णिमा राय, अमृतसर 

हवा के झोंके
छू रहे तन-मन
निश्छल यादें
बरबस उतरी
मन के द्वार
अखियों का पैमाना
ज्यों ही छलका
बादलों से टपकी
बूँद-बूँद से
भीग गई वसुधा
विरहाग्नि में
मूसलाधार वर्षा
हृदय नभ
हो गया आह्लादित
प्रिय मिलन
अनोखा प्रकृति का
भीनी सुगंध
अंग प्रत्यंग  हुए
पुलकित धरा के !

-0-



शनिवार, 12 मई 2018

807-अमृतरस


डॉ.कविता भट्ट

ये आलिंगन
हमारे नयनों के
अमृतरस,
मैं  आकण्ठ निमग्न
हर्षित मन
उद्वेलित-सा तन।
चलचित्र -से
घूमे मेरी स्मृति में
वे संस्मरण,
पुनः प्रियवर का
मिला सरस,
निश्छल आमंत्रण,
मूक अधर
आशा अनुगुंजन
प्रेम का निबन्धन ।
-0-
[ चित्र-गूगल से साभार]

शुक्रवार, 4 मई 2018

806-प्रेमग्रन्थ के पन्ने


डॉ.कविता भट्ट 

माना हो गए
अंतर्देशीय गुम
लिफ़ाफ़े-चिठ्ठी,
उन्हीं के साथ
दफ़न हो गई हैं
या भस्मीभूत
गुलाबी पंखुड़ियाँ,
महकी हुई
लिफ़ाफ़े के भीतर,
बार-बार थी
प्रियतमा पढ़ती
मुस्काते शब्द
अंत मे लिखा हुआ
सिर्फ तुम्हारा!
फैल जाया करती
उसकी आँखें
अनुभव करती
अद्भुत प्रेम
वह अनुभूति भी
हुई दफ़न
या कहूँ भस्मीभूत,
नहीं रुकेंगीं
प्रिय की आँखें कभी
लिखेंगी सदा
मुस्काती मौन रह
प्रेम की भाषा,
न ही होगी दफ़न,
न भस्मीभूत;
क्योंकि बदलती है
अभिव्यक्ति ही
अपरिवर्तित है-
पवित्र प्रेम,
इसका धर्म नहीं,
सार्वभौम है,
केवल सत्यता है
इसका धर्म
विज्ञान जहाँ खत्म,
वहाँ से शुरू!
प्रेम होता शाश्वत
परास्त हुई
तकनीक इससे,
इसीलिए तो
झँपती नहीं कभी
मुस्काती आँखें
और कनखियों से
देखती हुई
प्यारी तरल आँखें
 बिना लिफाफे
बिना अंतर्देशीय,
मोबाइल के;
पंखुरियाँ न सही
आँखें भेजतीं
पीड़ामिश्रित-आशा
मन के उद्वेग
बन्द होते झरोखे
कभी खुलते
झाँकती रश्मियों के
हाथ रचते
खुशबू से महके

 प्रेमग्रंथ के पन्ने...।
-०-
* सभी चित्र गूगल से *

मंगलवार, 24 अप्रैल 2018

804


हाइबन-
अनिता मण्डा
1-नादाँ हवाएँ


कभी सहसा बादल घिरते हैं, काली घटाएँ उमड़कर आती हैं। मोटी-मोटी बूँदें टप-टप का संगीत बनाती हैं। भीगी मिट्टी की सौंधी महक़ भीतर तक भरने को साँस इतनी गहरी हो जाती है कि आँखें स्वतः मूँद जाती हैं। बावरा मन पहले टप-टप के संगीत में भीगता है फिर सौंधी महक़ में। तन में एक तरंग उठती है झूमकर भीगने की, उसी तरंग में लबों पर कोई बरसाती गीत आ विराजता है। बरसों के बिछड़े पल क़रीब आने को मचलते हैं। कोई भीगी सी स्मृति सरसराती हवा में बिखर जाती है। तभी निगोड़ी हवा को जाने क्या सूझती है कि बादलों को हाँक ले जाती है। उमगी इच्छाओं का हिलोर फिर तलछटी पर जा बैठता है।
नादाँ हवाएँ
साथ उड़ा ले गई
काली घटाएँ।
2-सुधियाँ

अपने शहर में अरसे बाद आना अपनी स्मृतियों की हर शय पर जमी मिट्टी की पर्तें झाड़ना है। चाय की गुमटी, खोमचे वाला, पार्क की बेंच पर बैठे बुजुर्ग, फेरी वालों की आवाज़ें सब कुछ कितने समय बाद भी मन में वैसा का वैसा ही बना रहता है। एक चित्र सा जिसमें सभी चीज़ें चलती रहती हैं पर बदलती नहीं। चलती हुई चीज़ों की स्थायी  स्थिरता।  बरसों बाद भी वो चेहरे कभी बूढ़े नहीं होते। पुरानी परिचित गलियाँ, आइसक्रीम के ठेले, बसों के हॉर्न ,जाने किन किन चीज़ों से बातें निकल निकल आती हैं। एक पल पहले जो बात ख़ुशी बन याद आई थी अगले ही पल ने उसका अनुवाद उदासी में कर दिया।
वही गलियाँ
थाम हथेली चलीं
साथ सुधियाँ।

-०-
3- गौरव


रात की कालिख़  पोंछ प्राची दिशा से स्वर्ण रश्मियों की सवारी नित्य आ पहुँचती है जैसे कोई प्रशिक्षण पाया हुआ सैनिक कभी अनुशासन नहीं भूलता। कोने-कोने से तम के अवशेष बुहार कर उजाले की विविधरंगी सीनरी सज जाती है। उजाले के कई रंग होते हैं। अँधेरे का रंग सिर्फ़ अँधेरा ही होता है। जागते ही भोर निर्मल ओस से अपना मुँह धोती है। ओस कभी बासी नहीं हो सकती। उसे रोज़ बनना होता है। ऐसा कभी नहीं हो सकता कि कल की ओस से आज की भोर मुँह धोए। भोर हमेशा नई होती है। दोपहर कल की दोपहर की तरह अलसाई हो सकती है, शाम कल की शाम की तरह उदास, रात कल की रात की तरह अँधेरी, पर भोर हमेशा नई होगी। जैसे खिलखिलाहट हमेशा नई होती है। तो भोर और ओस दोनों एक जैसी होती हैं भले ही भोर के आने पर ओस मिट जाए। वही उसकी सार्थकता है। सार्थक होकर मिटने में मिटने का रंज शामिल नहीं होता। यहाँ मिट जाना ही उसका गौरव है।
ओस से धोए
भोर अपना मुख
सरसे सुख।

-०-

सोमवार, 23 अप्रैल 2018

803


हाइबन
1-सुदर्शन रत्नाकर
प्राकृतिक उत्सव
सुबह उठते जैसे ही दरवाज़ा खोला, शीतल ठंडी हवा के झोंके चेहरे को छूते हुए सारे बदन को भी रोमांचित कर गए. नारियल के पेडों की शाखाएँ मस्ती में झूम रही हैं। भोर के होते ही सागर में धीमी गति से उठती-गिरती लहरें दिखाई दे रही हैं। दूर-दूर तक फैला हुआ सागर हरा, नीला, काला, मटमैला दिखाई दे रहा है। चारों ओर शांत, नीरव वातावरण। कहीं भागदौड़ नहीं। गुनगुनी धूप अच्छी लग रही है। सर्दी होने पर भी मौसम सुहावना है। वुडकटर पक्षी का जोड़ा दीवार पर आकर बैठ गया है। , स्वीमिंगपूल में चोंच भर पानी पीकर, फिर डुबकी लगा कर उड़ जाता है। चिडिया का एक जोड़ा अभी भी दीवार पर बैठा है। शायद घोंसला बनाने की जगह ढूँढ रहा है।
पेडों पर बैठे अनगिनत पक्षी अपनी-अपनी आवाज़ में कलरव कर रहे हैं। उनके स्वर में संगीत है, लहरों के उठने-गिरने में संगीत है, हवा की गति में संगीत है। धीरे-धीरे फैलती सूर्य की किरणों में संगीत है। वातावरण की नीरवता में यह संगीत कितना मधुर लग रहा है। मैं घूँट-घूँट कर हवा पी रही हूँ, पक्षियों की छोटी-छोटी उड़ाने देख रही हूँ। यह संगीतमय प्रभात बेला का आनन्द मुझे रोमांचित कर रहा है।
मैं इस प्राकृतिक उत्सव को अपनी आँखों में बसा लेना चाहती हूँ जो मुझे महानगरों की ऊँची इमारतों और भीड़ भरी सड़कों में दिखाई नहीं देगा।
महानगर
लील गए प्रकृति
सपना हुई.
-0-
1-कमला घटाऔरा
1
मात प्रकृति
लगी सजाने नित
धरती बिटिया को
दे दे चुनरी
हरी, कभी सफेद
कभी रंग बिरंगी।
-0-

2-सब तमाशबीन
अनिता ललित
मन ये मेरा
ख़्यालों के जंगल में
फिरे अकेला!
यूँ काँटों में उलझा
है रस्ता भूला!
भटकती निगाहें–
ढूँढ़ें पनाहें!
थकी मैं पुकार के
कोई तो आए
नई आस जगाए
राह सुझाए!
हो ख्व़ाब में ही सही-
हाथ बढ़ाए!
आग का दरिया ये
पार कराए!
गहराते अँधेरे
रात के घेरे
हूक-भरी चिमनी
सन्नाटा चीरे!
ज़िन्दगी ग़मगीन
फ़रेबी साए-
क्या अपने, पराए
सब तमाशबीन!
-0-1 / 16 विवेक खंड, गोमतीनगर, लखनऊ-226010
ई मेल: anita. atgrace@gmail. Com
-0-

शनिवार, 7 अप्रैल 2018

801


डॉ ज्योत्स्ना शर्मा
1
जीवन तो होम किया
पर जिद ने मेरी
पत्थर को मोम किया।
2
कब दुख से घबराए
तानों के पत्थर
हरदम हमने खाए ।
3
धीरज तो खोता है
पत्थर के दिल में
सोता भी होता है।३
4
हाथों से छूट गया
पाहन से लड़कर
मन-दर्पण टूट गया।
5
माला अरमानों की
देकर चोट गढ़ी।
मूरत भगवानों की।
6
ना कहती ,ना सुनती
पाहन पीर हुई
बस अँधियारे बुनती।
7
अरमान नहीं दूजा
चाहत में तेरी
हर पाहन को पूजा ।
8
सब शिकवे भूल मिले
फिर तुमसे मिलना
पत्थर पर फूल खिले ।
-0-

शुक्रवार, 30 मार्च 2018

800



सुदर्शन रत्नाकर
तितली

बाल रवि अभी-अभी उदय हुआ है। मंद-मंद, सुगंधित शीतल हवा चेहरे का स्पर्श कर रही है। मैं प्रकृति की इस छटा का आनन्द ले रही थी कि मेरी दृष्टि पीले रंग की एक तितली पर गई ।जाने कितने समय के पश्चात् आज फूल पर बैठी तितली को देख रही हूँ। कंकरीट के जंगलों में विलुप्त होते प्राकृतिक उपादान चिंता का विषय बनते जा रहे हैं। चालीसवें माले पर गमलों में फूल-पौधे लगाकर हरियाली भले ही कर ली जाए : किन्तु तितली तो इतनी ऊँची नहीं न उड़ सकती।

बचपन में भाग-भाग कर तितलियों को पकड़ने की कोशिश और जब पकड़ लेते तो उसकी छुअन का जो अहसास होता था <उसकी अनुभूति आज भी रोमांचित कर रही है। तितली अब भी मेरे सामने है। एक फूल से उड़कर दूसरे फूल पर बैठती है, लेकिन लौटकर फिर उसी फूल पर बैठ जाती है। शायद यह फूल उसे अधिक आकर्षित कर रहा है। गहरे हरे रंग के पत्तों के बीच बैंगनी रंग के फूल और उस पर बैठी पीले रंग की तितली। इन तीनों प्राकृतिक रंगों की छटा को घूँट-घूँट पीती मैं सम्मोहन में बँधती जा रही हूँ। मैं इन क्षणों को अपने भीतर समा लेना चाहती हूँ।

तितली उड़ी
फूल-पंखुड़ियों के
गले जा मिली।
-0-

हाइबन

उन आँखों को भूलना आसान है क्या...?
प्रियंका गुप्ता

कई बरस बीत चुके हैं, मुझे हरिद्वार में हर की पैड़ी पर गए। पर जाने क्यों, जब भी...कहीं भी गंगा किनारे के घाटों पर जाती हूँ, दो निरीह...बूढ़ी और आशा से भरी आँखें मेरा पीछा नहीं छोड़ती। जाने कितने सवाल भरे हैं उन आँखों में...जवाब खोजते-खोजते थक गई हूँ, पर जवाब हैं कि हर बार मुँह मोड़कर चले जाते हैं। घाट की सीढ़ियों पर उतरती हूँ, तो दो लड़खड़ाते कदम, कँपकँपाते झुर्झुर हाथ मेरा सहारा लेने को आगे बढ़ आते हैं...पर चाहकर भी उन्हें थाम नहीं पाती। लपककर हाथ आगे बढ़ाती हूँ...सम्हालो अम्मा...पर फिर जैसे होश आता है। सामने न तो सवालों से भरी वह आँखें हैं, न वह डगमगाते कदम...और न ही वह कमज़ोर हाथ।

थककर वहीं सीढ़ियों पर बैठ जाती हूँ। नीचे उतरने की हिम्मत नहीं होती। पंडा कहता रह जाता है...नीचे जाकर आचमन करो बिटिया...गंगा मैया से माँग लो...जो माँगना है। मैया की मनौती खाली नहीं जाती। पर मैं माँगू भी तो क्या...? अन्दर अचानक ही जो खालीपन आ गया, उसे दूर करने की मनौती माँगू...या फिर ये...कि बरसों पहले जो सवाल सामने खड़े कर दिए थे तुमने...उनके जवाब ही दे दो मैया...?

आज भी...बहुत चाह कर भी दिलो-दिमाग़ से वह घटना नहीं निकल पाती। शादी के कुछ ही दिनों बाद देहरादून गई थी...मँझली बुआ सास के यहाँ...मोहिनी बुआ के यहाँ, तीन दिनों के लिए। दूसरा ही दिन था, जब देवर गौरव और ननदों दीपा, पारुल और प्रीती ने यूँ ही बैठे-बिठाए हरिद्वार-ऋषिकेश का प्रोग्राम बना डाला। राजीव तो नहीं जाना चाहते थे, पर उन्हें मनाने का भार दीपा ने सम्हाला। ऊपर से बुआ-फूफाजी का जोर...अरे, तुम्हारा न सही, बहू और इन सब का मन तो है। हो आओ एक दिन के लिए ही। हार कर राजीव तैयार हुए और एक बड़ी गाड़ी लेकर हम सब घर से रवाना हो गए. राजीव को ड्राइवर का पड़ोसी बना पीछे हम चारों फुलटूश मस्ती करते चल पड़े थे।

पहले ऋषिकेश थोड़ा-सा घूमते हुए हम सब शाम तक हरिद्वार पहुँचे...सीधे हर की पैड़ी पर। एकादशी का दिन था। सुहावना मौसम...एक बड़ा-सा जन-सैलाब...सामने हहराती गंगा जी। अप्रतिम नज़ारा था। हिम्मत तो नहीं थी, पर सबके कहने पर एक-दूसरे का हाथ पकड़कर नीचे की सीढ़ियों तक उतरी...गंगा का पानी ले अपने ऊपर छिड़क भर लिया। वापस ऊपर आकर सीढ़ियों पर बैठ नज़ारा देखते कब शाम का धुँधलका गहरा गया, अहसास ही नहीं हुआ। शाम की प्रसिद्ध गंगा-महा‍आरती का वक़्त हो रहा था। उठने ही लगी थी कि पीछे आ रही बातचीत कान में पड़ी...अम्मा, कब तक बैठी रहोगी...? भीड़ बहुत है, चलो उधर कोने में बैठा दूँ। अब कोई न आने वाला...बेकार ज़िद किए बैठी हो।

पीछे मुड़ कर देखा, अस्सी-पिचासी साल की एक बूढ़ी अम्मा मुझसे एक-दो सीढ़ी पीछे बैठी हुई थी। झुर्रीदार, पोपला मुँह...नाक पर बार-बार फिसल-सा आता मोटा चश्मा, जिसे वह नाक सिकोड़कर अपनी जगह पर टिकाए रखने का असफल प्रयत्न कर रही थी...और सफल न हो पाने पर गर्दन हल्की ऊँची कर उसे गिरने से बचाए हुए थी। सफ़ेद, थोड़ी मैली-सी धोती। कद शायद चार-साढ़े चार फुट से ज़्यादा नहीं रहा होगा। हाथ में एक गँदलाई-सी पोटली बड़े जतन से सहेजे हुए थी...मानो डर हो कि अशक्त जान कोई वह पोटली उनसे छीन न ले जाए। उस आदमी के उनके वहाँ से उठ जाने के इसरार के जवाब में उन्होंने बगल में रखी लाठी एक हाथ से पकड़ ली थी, जैसे ज़रा भी जबर्दस्ती हुई नहीं कि वह उस लाठी से उसका सिर ही फोड़ डालेंगी।

वो व्यक्ति उन्हें वहाँ से उठाने की कोशिश कर रहा था और वो...हम न जाबे, ब‍उआ अ‍इहें तो केहर ढूँढबे करि हमका...कहती उठने से इंकार किए जा रही थी। जाने क्यों हल्की उत्सुकता लगी। खुद को रोक नहीं पाई तो पूछ ही लिया...क्या हुआ अम्मा...? वह बूढ़ी अम्मा टुकुर-टुकुर मुँह देखने लगी। जाने मेरा सवाल समझ नहीं आया था या वह खुद नहीं समझ पा रही थी कि मेरी बात का जवाब क्या दें। उत्तर उस आदमी ने दिया...हुआ कुछ नहीं बिटिया। इनका बेटा इस बुढ़ापे में धोखा दे गया और ये हैं कि इस बात को मानने को तैयार ही नहीं। सुबह से इन्हें धोखा देकर यहाँ बैठा गया कि धर्मशाला ठीक करके आता हूँ...तब तुम्हें ले जाऊँगा। न उसको आना था, न वह आएगा। पर अब अम्मा को कौन समझाए...? इस तरह बीच में बैठी हुई हैं, भीड़ बढ़ रही। इधर लोग आरती के लिए खड़े होंगे...कहीं दब-दुबा गई तो क्या होगा...?

अम्मा शायद उसकी बात समझ रही थी, तभी गरियाने के से अन्दाज़ में अंट-शंट बोलने लगी...जिसका सार यही था कि उनका ब‍उआ जब कह कर गया है, तो आएगा उन्हें लेने। पर हकीक़त तो शायद सच में कुछ और ही थी। जिस तरह अपने विश्वास के समर्थन में उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, उसमें दिए की टिमटिमाती लौ-सी एक उम्मीद थी कि सच में उनका ब‍उआ उन्हें इस समय लेने आएगा न...? उम्र के इस पड़ाव पर, जब वे उसका सहारा नहीं बन सकती...वो उनको काँधा देने में हिचकिचाएगा तो नहीं न...? उनके इस विश्वास को आधार देने की कोई उम्मीद मेरे पास भी नहीं थी, सो मैंने भी नज़रें चुरा ली। आखिरकार उन्हें वहाँ से उठना ही पड़ा। राजीव के नाराज़ होने के कारण वहाँ से मुझे भी हटना पड़ा...पर जाते-जाते पीछे मुड़कर देखा...लड़खड़ा कर खड़ी होती अम्मा के हाथों से उनका आखिरी सहारा...वो लाठी...एक झटके से छूट कर जाने कहाँ विलीन हो चुकी थी।

भुला न पाऊँ
मिचमिची वह आँखें
सहारा माँगे।

रविवार, 25 मार्च 2018

799


बेटी तो प्यारी है
 -ज्योत्स्ना प्रदीप
1
बेटी तो प्यारी है
मेरे घर आई
ये मन आभारी है!
2
अधरों मोहक तानें
कलियों से झरते
मोती के कुछ दानें।
3
सुर-ताल अनोखा है
खुशबू का लोगो !
धीमा-सा झोंका है।
4
हर बात समझती है
वीणा-सी प्यारी
मीठी-सी बजती है।
5
वो जीवन की आशा
पढ़ लेती पल में
सुख-दुख की हर भाषा।
6
मन सुखमय करती है
प्यारा लेप बनी
हर पीड़ा हरती है।
7
फूलों-सी खिल जाती
भाग घने उसके
बेटी जो मिल जाती।
8
घर वह सुखकारी है
बेटी की बोली
बनती किलकारी है।
9
सुख-बेलें बढ़ती हैं
प्यारे पल हैं वे
जो बेटी पढ़ती हैं।
10
खुशबू वह प्यारी है
मन उसके ठहरो
वो खुद ही क्यारी है।
11
साँसों की हरकत है
बुरके के पीछे
वो ही तो बरकत है।
12
बेटी का ध्यान करो
मंत्र नहीं पढ़ना
चाहे न अज़ान करो।
13
मन पूजा की थाली
बेटा चावल-कण
बेटी तो है लाली।
14
मंगल ही करती है
समझो माता तुम
घर वह ही भरती है।
15
नभ पर छा जाती है
चंदा-सी बेटी
पग मान बढ़ाती है।
-0-

रविवार, 11 मार्च 2018

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अकल्पनीय

वक्त कब हमारे लिये क्या लेकर आ खड़ा होगा कोई नहीं जानता ।वह कभी कभी आनंद भरे अनमोल क्षण हमारी झोली में ऐसे भी डाल देता है जो हमेशा के लिये हमारे मन में घर बना लेते हैं । हम व्यर्थ ही उसे कोसते रहते हैं ।वह जब जो देता है उसका आनंद ही नहीं लेते ।किसी के दो मधुर बोल जब हमारे कानों से होकर दिल में उतरते हैं तो वे केवल बोल नहीं होते बल्कि बोलने वाले की रूह भी जैसे हमारे मन में आकर हमारी रूह से अपना अटूट रिश्ता बना लेती है सदा सदा के लिये ।
उसके साथ मेरा लगाव भी कुछ ऐसा ही है ।वक्त ने घुमा फिरा कर जाने किस गली से कहाँ से लाकर हमारी रूहों का गठबँधन करा दिया । उससे अपनी बात न मैं कहे बिना रह पाती हूँ और न वह । उस दिन अचानक मेरे फोन की घंटी टन टना उठी ।मैं चेक करने लगी यह नया नम्बर किस का है ।पता न चलने पर भी मैं आदतन बोल पड़ी ,"हैलो , जी कौन ?”
“पहचाना ? “ उधर से खुशी से भरी , शरबत घुली आबाज आई ।
उसने मुझ से फोन द्वारा बात करने का जुगाड़ कर ही लिया मुझे हैरानी में डालने के लिये ।
“क्या आप हैं मेरी मानस सखि ?  जिससे मैं रोज बात करती हूँ मन ही मन में ।”
“और कौन हो सकता है ?” वह खिलखिलाती हुई कहने लगी ,"मेरा सरप्राइज कैसा लगा ? “
“हैरान करने वाला और मूल्यवान भी।आज यह क्या सूझा ? हम रोज ही तो बात करते हैं न ! कोई बहुत जरूरी बात थी क्या तुरन्त कहने को ? "
“अपनी एक खुशी तुझ संग शेयर करनी थी ।तेरे समय निकालने तक का  इंतजार नहीं हो रहा था ।” वह चहक रही थी , छोटी बच्ची की तरह , “रिजल्ट आ गया है । बिटिया सेलेक्ट हो गई ।”
“ओ गुड ! मुबारक हो । भला सेलेक्ट कैसे न होती । बेटी किसकी है ।हर क्लास में प्रथम आने वाली मम्मी की बेटी होकर क्या वह कामयाब न होती !”
इस रिजल्ट के लिए हम दोनों ने बड़ी बेसब्री से इन्तजार किया था । 
ढेर  सारी प्रार्थनायों और अरदासों के साथ ।एक दूसरे को बधाई दे कर हमने यह पल सेलीब्रेट किया ।एक दूसरे का मुँह मीठा कराने के लिये अपनी माँगे भी रख दी । क्या सुहाना पल था वह ।
यूँ लिखित बात करने का हमारा रोज का समय तय था । लेकिन बोलकर बात करने का एक दूसरे की आवाज को सुनने का यह पहला अवसर था। मैं तो कोई बात ही न कर पाई । उसी ने बात की ।वह अपनी खुशी मेरे साथ शेयर करके हवा के सुगंधित झोंके की तरह आई और चली गई । मेरे कानों को उस की खुशी से लबालव भरी खनकती हँसी की गूँज अभी तक सुनाई पड़ रही है ।उसके शब्दों से छलकता मिश्री घुला मधुर रस मेरे रोम रोम को आनंदित कर रहा है ।उसका मिलन जन्म जनमान्तरों के बंधन ताजा कराने वाला लगा । यह भी लगा हम नव जन्म लेकर अपने पूर्व जन्म के प्यारे से मिल रहें हैं । जैसे वक्त ने संसार सागर से उछाल कर उसके प्यार का मूल्यवान मोती अनायास मेरी मन की हथेली पर धर दिया हो । मैं अचम्भित सी देख रही हूँ । उस से बात कर के मिली खुशी मन से उछल उछल पड़ रही है -

न्यारा बंधन
जुड़ा आन मुझसे
प्यार जन्मों का ।


कमला  घटाऔरा