शनिवार, 31 अक्टूबर 2020

940-कंकरीट के घर

  सुदर्शन रत्नाकर

 1

ऊँची मीनारें

कंकरीट के घर

भावहीन चेहरे

अंधी दौड़ में

भाग रहे हैं लोग

नियति के मोहरे

2

मौसम बीता

जीवन- साँझ हुई

ख़त्म हुईं बहारें

मन अकेला

ढूँढ़ता खोए मोती

बिखरे जो धूल में

3

बढ़ रही हैं

तेरी -मेरी दूरियाँ

कैसी मजबूरियाँ

खेल रहे हैं

अपने विश्वास से

वक़्त की बिसात पे

4

ये जो यादें हैं

 निकलती नहीं हैं

दिल की दीवार से

दर्द हैं देतीं

चुभती हैं कील -सी

दिन और रात में

 

5

काँच से रिश्ते

ठोकर लगे टूटें

सम्भालने हैं होते

नासमझी से

भावना में बहते

नियन्त्रण तोड़ते

 

6

बहने लगी

शरारती हवा जो

उड़ाकर ले आई

दिल में मेरे

चुपके से चुरा के

यादों की चूनर वो

7

दे दिया रास्ता

झुकाते हुए शीश

हो गई समर्पित

हरी दूब थी

उफ़  तक नहीं की

लुटा दिया जीवन

8

जब टूटता

भरोसा किसी का भी

बिखरता जीवन

विडम्बना है

तार नहीं जुड़ते

टूट जाता है मन

9

ज़रा देखो तो

खिलखिलाती कली

रंगों साथ खेलती

कहती है क्या

जीवन चार दिन

अंत होता मरण

10

झूठे सपने

क्षणिक सुख देते

पीड़ादायक होते

मन बींधता

मछली सा तड़पे

राह नहीं है पाता

-0-

सुदर्शन रत्नाकर

-29,नेहरू ग्राँऊड

फ़रीदाबाद-121001

मोबाइल-9811251135

बुधवार, 28 अक्टूबर 2020

939-रघुवर आ जाओ

 

 ज्योत्स्ना प्रदीप

1

आलोकित करती  है

छवि रघुनंदन  की

मन मोहित करती  है ।

2

जयघोष सभी  करते

जब -जब पाप बढ़ा

तुम रूप नया धरते ॥

3

रावण  को मारा  था

विजय दिवस की जय

धरती को तारा  था।

4

इस दिन का मान करो

विजय धरम की  है

रघुवर का ध्यान करो।

5

जग फिर से  दुखियारा

राघव आ जाओ

कर दो फिर उजियारा ।

 6

पीड़ा में  हर  सीता

जो जितना  पावन

दुख जीवन में बीता!

7

जग  बहुत दुखी, रोगी

रघुवर  अब  आओ

घायल साधू,जोगी।

         -0-

मंगलवार, 20 अक्टूबर 2020

938

 1-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

1

छोटी-सी नाव

तैरा निंदा का सिन्धु

डुबाने वाले लाखों,

फिर भी बचे

प्रिय आओ ! यों करें

कुछ दर्द बुहारें।

2

मूक हैं गान

अश्रु में डूबा नभ

बिछुड़ गई धरा,

प्राण विकल

जीने के लिए नित

मरे कई मरण।

-0-

2-डॉ.महिमा श्रीवास्तव

1

मन उलझे

विचित्र धागे होते

प्रेम के ताने-बाने,

जो सुलझा

और फँसता जा

उलझा रह जा

2.

अन्याय बढ़े

धैर्य डगमगा

अवसाद से घिरे

प्रभु का जाप

हरे मन की पीड़ा

भरे जय की ऊर्जा।

      -0-

रविवार, 18 अक्टूबर 2020

937

 

1-रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

1

बहे समीर

उड़ें दु:-बदरा

तन, मन, पुलकें

चमकें नैन

बीती दुख की रैन

मुकुलित कजरा।

(18 अक्तूबर 20)

2

छू गए मन

अनुराग-वेष्ठित

मधुमय वचन

मन आँगन

झरे हरसिंगार

हँसे जड़ चेतन

 (15 अक्तूबर 20)

-0-

चलते ही रहना

- डॉ. जेन्नी शबनम 


जीवन जैसे  

अनसुलझी हुई 

कोई पहेली 

उलझाती है जैसे

भूल भूलैया,

कदम-कदम पे 

पसरे काँटें  

लहुलुहान पाँव 

मन में छाले 

फिर भी है बढना  

चलते जाना, 

जब तक हैं साँसें

तब तक है 

दुनिया का तमाशा 

खेल दिखाए 

संग-संग खेलना 

सब सहना, 

इससे पार जाना 

संभव नहीं 

सारी कोशिशें व्यर्थ

कठिन राह 

मन है असमर्थ, 

मगर हार 

कभी मानना नहीं 

थकना नहीं 

कभी रुकना नहीं 

झुकना नहीं

चलते ही रहना 

न घबराना 

जीवन ऐसे जीना 

जैसे तोहफ़ा

कुदरत से मिला 

बड़े प्यार से 

बड़ी हिफाज़त से 

सँभाल कर जीना !

-0-

बुधवार, 7 अक्टूबर 2020

936

ज्योत्स्ना प्रदीप 

1

मन- वीणा  बजनी है 

तुमसे मिलने की 

पहली ये  रजनी है ।

2

मधुमाधव मन  आया 

मलय समीर हँसा 

मौसम ये मुसकाया ।

3

नैना जलजात बनें 

पीर- भँवर बंदी 

देखो उस रात बनें !

4

जीवन अब  तेरा है 

प्राची नाच उठी 

दिल में न अँधेरा है ।

5

नव प्रेम कहानी है 

तेरे संग पिया 

इक सदी बितानी है ।

6

तू कैसा रे  प्रियतम 

भूला प्रेम  घना 

मुनि बेटी- सा ये  मन !

7

तन -मन का वो बंधन 

 पल  में बिसराया

अब शेष बचा  क्रंदन ।

-0-

 

मंगलवार, 6 अक्टूबर 2020

935

 1-डॉ. सुरंगमा यादव

1

ये प्रीत पुरानी है


अधरों पर फैली

मुसकान निशानी है।

2

चंदा जब आता है

रह-रह कर मन में

इक हूक उठाता है।

3

जन्मों के नाते हैं

जब तुमको देखूँ

नैना सुख पाते है।

4

पाया तुमको जब से

भाग्य बड़ा अपना

प्यारा लगता तब से।

5

अब दूर न जाएँगे

सुख-दुःख जीवन के

हम संग उठाएँगे।

6

रीता मन का प्याला

तुमने पल भर मे

प्रेम-सुधा भर डाला।

-0-

रविवार, 20 सितंबर 2020

934

1-मंजूषा मन

1

ये आँखें भर आईं

तुमने प्यार -भरी


बातें जो दुहराईं।

2

छलकीं आँखें मेरी

तड़पाएँ  मन को

प्रियवर यादें तेरी।

3

छाए हैं मेघ घने

स्वप्निल पावस की

आशा का स्रोत बने।

-0-

2-रश्मि विभा त्रिपाठी 'रिशू'

1

यूँ तुम बिन जीते हैं 


ज़हर जुदाई का

हर पल हम पीते हैं। 

2

क्यों ये मजबूरी है

अब तो आ जाओ 

तड़पाती दूरी है।

3

कब तक ग़म खाएगा

रात ढली दिल की

वो अब ना आएगा।

4

अँधियारा है जीवन

सूरज सम आओ

तुम लेकर रूप- किरन।

5

ये बदरी जो छाई

रिमझिम बनकरके

यादें  लेकर आई 

6

कुछ घाव निराले हैं

दूर नहीं होते

ये गम के छाले हैं।

7

प्रति पल ही रुदन करे

प्रिय बिन विरहन का

मन कैसे धीर धरे !

8

साँसें ये बिखरी हैं 

निस दिन नाम जपे

पीड़ाएँ निखरी हैं ।

-0-