रविवार, 6 अक्टूबर 2013

आज का सच


सीमा स्मृति
    1
ये सिलसिला
खौफ के घने साए
बढ़ते चले जाएँ,
माँ- बेटी -बहू
हर दिल पे छाएँ
काश ऐसा हो जाए।
           2
वो नाजो पली
काम पर थी चली
बाधाएँ रोज़ मिलीं,
पार न पाए
हर ओर दानव
कैसे लाज बचाए।

    3
हर शहर
दरिन्दे हैं घूमते
जाल हैं बिछाते,
क्यों मैं बेटी हूँ
रोज देते हैं घाव
देवी कह सताते ।
-0-

गुरुवार, 3 अक्टूबर 2013

सपनो में रंग भरो

1-शशि पुरवार
1
तपती  है  जब धरती
बदली ना बरसी
वो छिन- छिन है मरती ।
2
सपनो में रंग भरो
नैना  सजल हुए
जितने भी जतन करो।
3
माँ जैसी बन जाऊँ
छाया हूँ उनकी
उन तक न पहुँच पाऊँ।
4
सब भूल रहे बतियाँ
किसको बतलाएँ
कैसे बीतीं रतियाँ ।
5
फिर डाली ने पहने
रंग भरे नाजुक
ये फूलो के गहने .
6
डाली -डाली  महकी,
भौरों की गुंजन,
क्यों चिड़िया ना चहकी।
-0-
2-हरकीरत हीर
1
ये रिश्ते ठहरे से
देकर घाव गए
उम्रों के गहरे से ।
2
जो छूट  गए थे कल
खोज रही हूँ फिर
रब्बा! प्यारे वो पल ।
-0-
3-कविता मालवीय 
1
आई तेरी पाती 
बार-बार साँकल 
पुरवैया खड़काती
2
रख लो मन को ख़ाली  
यादों का भाड़ा 
दे देगी कंगाली  
-0-

बुधवार, 2 अक्टूबर 2013

साँझ झुकी है




 














[28 सितम्बर को आदरणीया डॉ सुधा गुप्ता जी को ‘अन्तर्राष्ट्रीय साहित्य कलामंच मेरठ’ द्वारा ‘महीयसी महादेवी वर्मा साहित्य सम्मान  प्रदान किया गया  । यह सम्मान  एक समारोह में डॉ  वेदप्रकाश ‘वटुक’ द्वारा प्रदान किया गया।बाएँ  से सम्मान देते हुए डॉ  वेदप्रकाश ‘वटुक’, डॉ सुधा गुप्ता जी औरड़ॉ राम गोपाल भारतीय।
हाइकु और त्रिवेणी परिवार की ओर से कोटिश: बधाई !
आज इस अंक में आपके 12 सेदोका दिए जा रहे हैं।
-डॉ हरदीप सन्धु –रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’]
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डॉ सुधा गुप्ता


1
न तो है छाया
न कोई परछाई
मस्त खड़ा अकेला
पत्तों की माया
नहीं लुभाती मुझे
मैं ठूँठ अलबेला ।
2
छाया बनके
जीती रही ताउम्र
अबला रही नारी,
जिस दिन से
खड़ी हुई अकेली
नर पे पड़ी भारी ।
3
रास न आई
ज़िन्दगी की खुशियाँ
सदा रहीं पराई
डोलती रही
मन-दर्पन पर
अचीन्ही परछाई ।
4
अपनों ने दी
सदा शिकस्त मुझे
और कुरेदे घाव
इठलाते थे
कर-करके छेद
जल्दी डूबे ये नाव।
5
साँझ झुकी है
उमड़ते आ रहे
उदासी के बादल,
आगे जो बढ़ूँ
हताशा की झाड़ियाँ
खींच लेतीं आँचल
6
कैसे तो रोकें
घिर-घिर आते हैं
उदासी के बादल
डुबो खुद को
हँसी की चाशनी में
करें तुमसे छल ।
7
छँटते नहीं
उदासी के बादल
मन हुआ तरल,
आशा की धूप
खिलखिला जो हँसे
डगर हो सरल ।
8
सैर को चले
अंजान दुनिया में
कौतूहल से भरे,
आगे जो मिले
करते यही गिले;
तूफ़ान बहुत हैं ।
9
ऊषा जो जागी
सूरज की किरन
गुदगुदा के भागी,
गा उठे पंछी
किसने किया जादू
समझा नहीं कोई !
10
ममता-भरी
नेह की बौछार से
जोड़ती परिवार,
अमृत लेप
संजीवनी बूटी माँ
समझा नहीं कोई !
11
भूलेंगे कैसे !
वे हरे -भरे दिन
चाँदनी-भरी रातें,
दूर जा पड़े
बचपन के खेल
झगड़ों की सौगातें।
12
कैसे भूलेंगे!
चाँदनी का  वो नशा
पहली बार हुआ
हँसा था चाँद
पसीजी हथेली में
रख के  कोई दुआ ।
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27 सितम्बर-2013

सोमवार, 30 सितंबर 2013

बगिया में दूब रची



डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा 
1
रचना क्या ख़ूब रची !
दुनिया में नारी ,
बगिया में दूब रची ।
2
रिश्ता यूँ टूट गया 
पश्चिम ना अपना 
पूरब भी छूट गया।
3
किस पर इल्जाम रखें 
बीज बबूल दिए 
कैसे अब आम चखें।
4
छोड़ें भी नादानी 
कदर यहाँ हमने 
खुद अपनी  नाजानी |
5
उनसे जब प्यार हुआ 
साँसें गीत बनीं 
जीवन उपहार हुआ ।
6
कैसा उपहार दिया 
बोल गए कान्हा 
लो तुमको तार दिया ।
7
कान्हा मत हास करो 
तार न अब चलते
मन आस-उजास भरो !
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