गुरुवार, 18 जुलाई 2019

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शशि पाधा
1
चुप थी मैं भी
और मौन तुम भी
तुम्हारा स्पर्श
कुछ पिघला गया
मौन मुखर हुआ।
2
मेघा गरजे
गाने लगी बदली
राग  मल्हार
शाख- शाख पी रही
रिमझिम  फुहार।
3
आज भोर ने
घबराते-लजाते
ओढ़ ली धूप
मौसम गुनगुनाया
स्वर्ण सौगात लाया ।
4
शांत झील में
तैरना चाँदनी का
या कोई गीत
पहाड़ में गूँजना
सौन्दर्य-इन्द्रजाल।
 5
रहूँ ,न रहूँ
फर्क नहीं पड़ता
क्या किया मैंने
वही है मेरा नाम
वही पहचान भी।
-0-

13 टिप्‍पणियां:

अनिता मंडा ने कहा…

मधुर महकती रचनाएँ

Sudershan Ratnakar ने कहा…

ताजगी लिए हुए सुंदर तांका।बधाई शशि जी

Dharm Jain ने कहा…

बहुत अच्छी रचनाएँ, बधाई शशि जी।

प्रीति अग्रवाल ने कहा…

शाख शाख पी रही.... कितनी बार पढ़ चुकी.... प्यास ही नही बुझ रही.....अति सुंदर।

मेरा साहित्य ने कहा…

Bahut sunder likha hai badhayi bahut badhayi
Rachana

Ramesh Kumar Soni ने कहा…

मौन मुखर हुआ और राग मल्हार गूंज उठे .....
अच्छी रचनाएँ , बधाई ।

dr.surangma yadav ने कहा…

बहुत सुन्दर रचनाएँ ।बधाई आपको ।

Dr. Purva Sharma ने कहा…

मनभावन रचनाएँ ... बहुत सुंदर

Jyotsana pradeep ने कहा…

बहुत मनमोहक रचनाएँ ....हार्दिक बधाई आद. शशि जी !!

Vibha Rashmi ने कहा…

शशि जी वर्षा ऋतु के भीगे भीगे हाइकु ।सुखद ।बधाई ।

Anita Lalit (अनिता ललित ) ने कहा…

बहुत प्यारे ताँका! हार्दिक बधाई शशि दीदी!

~सादर
अनिता ललित

सविता अग्रवाल 'सवि' ने कहा…

बहुत बढ़िया रचना शशि जी हार्दिक बधाई |

Krishna ने कहा…

बहुत सुंदर ताँका...बधाई शशि जी।