गुरुवार, 18 मार्च 2021

960

1-गुंजन अग्रवाल

1

फागुन की रुत आई 

फूट पड़े अंकुर

सुधा फिर हर्षाई।

2

करताल बजाते हैं

पेड़ों के पत्ते

फगुआ भी गाते हैं।

3

जब दहक उठे टेसू

यादों में सजना

औ भीग गए गेसू।

4

अलि गुंजन करते हैं

फूलों -कलियों से

मधु रस वो भरते हैं।

5

हँसती हैं जब कलियाँ 

पागल- से भँवरे

सुधि लेते हैं बगियाँ।

6

फागुन रुत भरमाई 

याद पिया तेरी

आँखों से झलकाई।

-0-

2-रश्मि विभा त्रिपाठी 'रिशू'
1
हम कहाँ अकेले हैं
मन-आँगन निश दिन
सुधियों के मेले हैं।
2
अखियाँ हैं भर आती
उर-तरु से उड़ते
सुधियों के जब पाखी।
3
अमरित का प्याला है
प्रेम जिलाता है
यह जीवन- हाला है।
4
यादों की इक पाती
बाँचे जब ये मन
अँखियाँ भर-भर आतीं
5
जीवन- से प्यारे हो
डूबे मन के पिय
तुम एक सहारे हो
6
नैनों से नीर बहे
बुँदिया इक खारी
सब अपनी पीर कहे
7
मन पाखी उड़ता है
धरती से अम्बर
पिय को ही तकता है
8
हमको अफ़सोस रहा
निष्ठुर को चाहा
अपना ही दोष रहा
9
क्या साथ निभाएगी
धोखे में डूबी
यह प्रीति रुलागी
10
अब और न तरसाओ
साँसें बुझने को
अंतिम पल आ जाओ

-0-


शुक्रवार, 12 मार्च 2021

959

 सेदोका-नारी

सुदर्शन रत्नाकर

 

1

नारी की सोच

सागर- सी गहरी

फिर भी वो बेचारी

क्यों ऐसा होता

तिल- तिल जलती

खुशियाँ वो बाँटती

 

2

छुपा लेती है

भीतर ही भीतर

मन की सारी पीड़ा

वाह री नारी

गरल सदा पीती

 फिर भी मुस्कुराती

3

रहती शांत

धधके चाहे ज्वाला

भीतर जितनी भी

भावनाओं की

करती समझौता

सपने ले उधार।

4

अल सुबह

ठिठुरती औरतें

सरदी का मौसम

बीनें कचरा

पीठ पे लादे बोझ

अभिशप्त होने का

5

नैनों में पानी

अधरों पे मुस्कान

घुटन में रहती

नहीं कहती

अभिशप्त जीवन

नारी आज भी जीती।

6

चुप न रह

मुखर होना सीख

मन की बात कह

घुटे न साँस

शक्ति को पहचान

अपना हक़ जान।

7

लुटती रही

नारी हर काल में

भावना के अस्त्र से,

बँधती रही

ममता की डोर से

 फिर भी जीती रही।

8

सीमा होती है

हर अत्याचार की

कब तक सहोगी?

उठ, जाग जा

स्वयं को पहचान

दुर्गा का रूप दिखा।

9

घूमती रही

फिरकी की तरह

जिधर हवा बही

जीवन भर

पतंग की तरह

डोर से बँधी रही।

10

जूझती रही

अकेली तूफ़ानों से

कठिन है डगर

पाँवों में छाले

पर चलती रही

हारी नहीं जीवन।

-0-सुदर्शन रत्नाकर ,ई-29,नेहरू ग्राउंड ,फ़रीदाबाद -121001

मो.9811251135

रविवार, 7 मार्च 2021

958-कण्ठ है प्यासा

 पिछले दस वर्षो के 4 लोकप्रिय  अंकों में से एक -कण्ठ है प्यासा आज प्रस्तुत है, जो हरियाणा प्रदीप में भी प्रकाशित है।



मंगलवार, 2 मार्च 2021

957-इक बार चले आओ

 डॉ.कविता भट्ट 

माहिया सुनने के लिए नीचे दिए गए विडियो को क्लिक कीजिए-

लिंक निम्न है-
माहिया 


मंगलवार, 16 फ़रवरी 2021

955

 1-सुदर्शन रत्नाकर

1

धानी चूनर

ओढ़ के वसुंधरा

खुशी से इठलाई

ले अँगडाई

मौसम है बदला

ऋतु वसंत आई।

2

श्वेत गजरे

काले कुंतल सजे

सतरंगी फूलों की

कंठ में माला

पहन पीली साड़ी

धरा हरियाई है।

3

मिठास भरा

हुआ वातावरण

आया है मधुमास

चाँदनी रात

मधु है बरसाती

स्वच्छ होती प्रकृति ।

4

खिले हैं फूल

तितलियों का मेला

भँवरों की गुँजार

मधुमक्खियाँ

चूसें मिल पराग

आया है मधुमास।

5

अमराई में

कूक उठी कोयल

बजी ज्यों शहनाई

लेके बारात

लो आ गया वसंत

बाँधी है पाग पीली। 

6

ऋतु वसंत

खिले दिग-दिगन्त

बावरी हुई हवा

कर शृंगार

धरा बनी दुल्हन

दूल्हा बना गगन।

 7

महक उठी

मंजरी पेड़ पर

बहने लगी बयार

खिलने लगीं

चंपा और चमेली

गूँजी कोकिल तान।

-0-

सोमवार, 1 फ़रवरी 2021

954

 

रिश्ते

सविता अग्रवाल 'सवि' (कैनेडा)

1

मैले थे रिश्ते

धो-धोकर निखारे

प्रेम -साबुन संग

आया निखार

सुगंध मन रची

बगिया फिर सजी।

2

बिखरे रिश्ते

दामन में समेटे

गठरी-गाँठ बाँधी

खुले ना कभी

इत्र छिड़ककर

प्रेम -कोठरी धरी।

3

चंचल रिश्ते

सागर लहरों -से

अठखेलियाँ करें

तट पर आते

मिलन-आस लिये,

पर बिखर जाते।

4

गीले थे रिश्ते

स्नेह -धूप लगाई

परतें खोलीं जब

गर्माई आई

प्रेम-चादर बिछी

सुन्दर छटा पाई।

5

स्नेह- लिपटे

गुड़ चिक्की- से रिश्ते

देखूँ मैं ललचाऊँ

थाली में भर

मिठास से उनकी

सुख-आनंद पाऊँ।

6

शूल जो चुभे

कटे घावों पर मैं

मरहम लगाऊँ

रिश्तों की गर्मी

देकर सहलाऊँ

अनुभूतियाँ पाऊँ।

7

बाँधे न बँधें

सिंधु- लहरों जैसे

उठते- मचलते

डोलते रिश्ते

तट से कैसा नाता?

छूकर चले जाते।

8

वक़्त ले उड़ा

संग रिश्तों की डोर

दूर पर्वतों पर

चढ़ूँ तो कैसे

थक गए क़दम

पकड़ नहीं पाऊँ।

9

बेनाम रिश्ते

अहसासों में पलें

दिलों की धड़कन

नयन बसे

गुमनामी की उम्र

स्मृतियों में ही जिए।

10

मीलों चलते

हाथ पकड़कर

दूरी तय करते

बँधे से रिश्ते

ठोकर लगते ही

गहरी चोट खाते।

11

रिश्तों की गंध

बगिया उपवन

घर- द्वार -आँगन

उजास भरे

उजाले-सी उजली

चिर दीपक जले।