रेखा रोहतगी
1
इस जग में
सबसे विचित्र है
मानव-मन
सुखों को पाकर भी
होता निराश
दुखों
में भी न हुआ
कभी हताश
कभी हारकर भी
हार न माने
भीड़ में भी अकेला
स्वयं को माने
अकेलेपन को भी
कभी
मेला ही जाने ।
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2
मानसर में !
चुगता रहा मोती
मन का हंस
आँखें बन चकोर
पीती ही रहीं
चन्दा तेरी किरनें
सपने में भी
झपके न पलक
तेरी ललक
नेह-चाशनी पागी
लगन लागी
पंख उगे बिना ही
मैं तो हो गई पाखी ।
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