सेदोका -छह पंक्तियों की 5-7-7-5-7-7=38 वर्णक्रम की जापानी कविता है,जिसका प्रचलन 12 दशक से भी ज़्यादा पुराना है ।
-रामेश्वर काम्बोज हिमांशु
1-डॉ सुधा गुप्ता
1
गुलशन में
शाख़ो-शज़र वही
बहार की मस्ती भी
कसक यही
बस एक आशियाँ
शाख़ से टूट गिरा ।
2
मेघ न आए
आषाढ़ बीत गया
सावन रीत गया,
विरह-व्यथा
यक्ष किसे सुनाए
कैसे भेजे सन्देसा ?
3
बाग़ हरा है
फल-फूलों - भरा है,
है अकूत सम्पदा
बाग़बाँ भूखा
करता रखवाली
न मिले रूखा -सूखा ।
4
पतझर में
वन-फूल खिला था
रंग-रूप मिला था
सही उपेक्षा
चलाचली की बेला
छूट गया अकेला ।
5
विरही यक्ष
बैठा विरहाकुल
कुटज- पुष्प लिये
प्रतीक्षारत
प्रतीक्षारत
मेघदूत आ जाए
तो सन्देश पठाए !
-0-
2- रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
1
छुपा है चाँद
आँचल में घटा के
हुई व्याकुल रात
कहे किससे
अब दिल की बात
गिरे ओस के आँसू ।
2
उमग पड़ी,
खुशबू की सरिता
पुलकित शिराएँ ।
‘ नहीं छोड़ेंगे’-
कहा जब उसने,
थी महकीं दिशाएँ ।
3
लहरा गया
सुरभित आँचल,
धारा बनकरके
बहे धरा पे
सुरभित वचन ;
महका था गगन ।
4
बीता जीवन
कभी घने बीहड़
कभी किसी बस्ती में
काँटे भी सहे
कभी फ़ाक़े भी किए
पर रहे मस्ती में ।
5
तुमसे कभी
नेह का प्रतिदान
माँगूँ तो टोक देना
फ़ितरत है-
भला करूँ सबका
बुरा हो रोक देना ।
-0-
3-डॉ भावना कुँअर
1
काटे न कटे
पिया बिन ये रातें
पुकारे जब पीहू
मुश्किल जीना
करे किससे हम
दर्द लिपटी बातें।
2
तेज़ तूफान
हैं ढूँढती आसरा
वो नन्हीं -सी गौरैया
बचाए कैसे
इस मुश्किल घड़ी
अपने नन्हें प्राण।
-0-
14 टिप्पणियां:
नई विधा से परिचित करवाने के लिए आभार
सभी सेदोका बहुत ही सुंदर और मनभावन !
डॉ सुधा गुप्ता,रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ भाई जी और डॉ भावना कुँअर को बहुत-बहुत बधाई !
आज एक नई विधा से परिचित हुई,आभार...। आदरणीय सुधा जी, काम्बोज जी और भावना जी को अच्छे सेदोका के लिए बधाई...।
प्रियंका
पतझर में
वन-फूल खिला था
रंग-रूप मिला था
सही उपेक्षा
चलाचली की बेला
छूट गया अकेला ।
Sudha ji dil ko jhkajhor kar rakh diya aapki in panktiyon ne...aapko tahe dil se karodon shubkamnaayen..
‘ नहीं छोड़ेंगे’-
कहा जब उसने,
खुशबू की सरिता
उमग पड़ी,
महकी दिशाएँ
पुलकित शिराएँ ।
kamboj ji aapki lekhni ka bhi javaab nahi man ke bhaav yun fuut padte hain saaf dhudhiya jharna nirantar bahta hai...hardik badhai..
नई विधा से परिचित कराने के लिए आभार।
सभी सेदोका बहुत सुन्दर सुधा जी, हिमांशु जी एवं भावना जी को बहुत-२ बधाई।
कृष्णा वर्मा
नयी विधा की जानकारी मिली ... आभार ... सभी रचनाएँ बेहद सुंदर ॥
behad khoobsurat abhivyaktiyaan is nayi vidha mein.. :) aabhar aap sabhi ka is naye ras se ham sab ko saraabor karne ke liye.. :) bhai rameshwar ji.. dr sudha evam dr bhavna.. sabhi ki kritiyaan bhaavpoorna... :)
बहुत ही सुंदर और मनभावन...बहुत-बहुत बधाई !
नई विधा से परिचय के लिए शुक्रिया....इसके लिए हिमांशु भाई साहब के आभारी है....सभी सदोका सुंदर और एक से बढ़ कर एक है.......
सभी सेदोका बहुत सुंदर ....
बाग़ हरा है
फल-फूलों - भरा है,
अकूत सम्पदा में
बाग़बाँ भूखा
करता रखवाली
न मिले रूखा -सूखा ।.....
तुमसे कभी
नेह का प्रतिदान
माँगूँ तो टोक देना,
फ़ितरत है-
भला करूँ सबका
बुरा हो ,रोक देना ।..तथा
तेज़ तूफान
हैं ढूँढती आसरा
वो नन्हीं -सी गौरैया
बचाए कैसे
इस मुश्किल घड़ी
अपने नन्हें प्राण।...मन को छू गये ...बहुत बहुत धन्यवाद ....बधाई आपको
एक नयी विधा की जानकारी हेतु,आभार!!
अनुपम भाव लिये उत्कृष्ट प्रस्तुति।
पहली बार इस विधा के बारे में जानकारी मिली. यूँ तो सभी सेदोका बहुत भावपूर्ण और अर्थपूर्ण है पर ये बहुत ख़ास लगा...
तुमसे कभी
नेह का प्रतिदान
माँगूँ तो टोक देना,
फ़ितरत है-
भला करूँ सबका
बुरा हो ,रोक देना ।
सुधा जी, भावना जी और काम्बोज भाई को बधाई और धन्यवाद.
wahh adbhut sedoka hai sabhi .. vivdh bhawo ko chitrit karte .. sudha ji ,bhawna ji ,kamboj bhaiya ji shubhkamnaye ..evem badhayi
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