गुरुवार, 21 नवंबर 2013

साँसों की लय



डॉ जेन्नी शबनम

साँसें ज़िन्दगी
निरंतर चलती
ज़िंदा होने का  
मानों फ़र्ज़ निभाती,
साँसों की लय
है हिचकोले खाती  
बढ़ती जाती  
अपनी ही रफ़्ता 
थकती रही
पर रुकती नही
चलती रही
कभी पुरजोरी से
कभी हौले से
कभी तूफ़ानी चाल
हो के बेहाल
कभी मध्यम चाल
सकपका के  
कभी धुक-धुक सी 
डर-डर के
मानो रस्म निभाती,
साँसें अक्सर 
बेअदबी करती
इश्क़ भूल के
नफरत ख़ुद से
नसों में रोष
बेइन्तिहा भरती
लगती कभी
मानो ग़ैर जिन्दगी,
रहे तो रहे
परवाह न कोई
मिटे तो मिटे
मगर साँसें घटें
रस्म तो टूटे
मानो होगी आज़ादी,
कुम्हलाई है
सपनों की ज़मीन
उगते नही
बारहमासी फूल
जो दें सुगंध
सजा जाए जीवन
महके साँसें
मानो बगिया मन,
घायल साँसें
भरती करवटें
डर- डर के
कँटीले बिछौने पे
जिन्दगी जैसे
हूलुहान साँसें
छटपटाती
मानों  जिन्दगी
रोती

आहें भरती
रुदाली बन कर
रोज़ मर्सिया गाती ।
-0-

मन में विष भरा



ताँका    
1-पुष्पा मेहरा              
1
सूरज तपे
चाँद को प्रकाश दे
कृतघ्न चाँद
जब भी मौका पा
सूर्य को ही छुपाए
2
 मौन हो खड़ी
 मगन बक-पंक्ति
 मन - लाप
 केवल मीन-राग
 न तो बाजा न ताल ।
3
 वाणी अमृत
 मन में विष भरा
 प्यार में अंधा
 भेद न जान पाया
 धोखे पे धोखा खाया ।
-0-
2-डॉ अनीता कपूर
1
 ये जो अपने
बनते हैं यूँ ख़ास
औढ़े चादर
ऊपर से उजली
अंदर दागदार ।
2
 चारों तरफ
उग आए है रिश्ते
गिरगिटों -से
संवेदनाओं -लदी
लताएँ मर रही ।
-0-
3-डॉ सरस्वती माथुर
 1
परायापन
घनी पीड़ा दे गया
मन में एक
जर्द- सा दर्द देके
नश्तर चुभो गया !
2
स्वार्थघृणा का 
 देखो तो  बोलबाला  
आया समय
है कितना  निराला  
गैर से  रिश्ता आला!
-0-

सोमवार, 18 नवंबर 2013

दीपशिखा सी मैं


अनिता ललित

दीपशिखा- सी
जलती हरदम
तेरे आँगन
कुछ यूँ सुलगती
मैं पिघलती
अंदर ही अंदर!
आँसू में डूबे  
अरमान जलते
और फैलता 
उदासी का उजाला
तन्हाई ओढ़े!
सुलगते जो ख़्वाब,
सभी हो जाते
ख़ामोश, धुआँ-धुआँ
भीगता वो आँगन!

-0-

शनिवार, 16 नवंबर 2013

आशा हो नयन में



डॉ  ज्योत्स्ना शर्मा 
1
सजे चमन 
विविध रंग पुष्प 
खिलखिलाएँ
आशा हो नयन में 
सदा सन्मार्ग पाएँ ।
2
अधर सजे 
मधुर मुस्कान से 
शिखर छू लें 
दमके गगन में 
ज्यों विहान हो !
-0-

मंगलवार, 12 नवंबर 2013

तेरा मिलन




डॉ हरदीप कौर सन्धु
तेरा  मिलन
सुना जाता है मुझे
हर पल ही
अनकहा -सा दर्द
बहता रहा
जो तेरी अँखियों से
निचौड़ी गई
अधूरे अरमान
कठिन राह
अब कहाँ से लाऊँ
पी खींचती 
कोई जादुई दवा
धीरे -धीरे से
तेरे खुले ज़ख्मों पे
रखने को मैं
उठी बिरहा -हूक
बेनूर हुई 
लबों पे आ लौटती
काँटों चुभती
तीखी -सी टीस ने
हौले -हौले ही
समय की तल पे
यूँ  फ़ाहे रख
खुद ही हैं भरने 
तेरे दिल  के 
अक औ असह्य 
गहरे  दर्द- ज़ख्म !
-0-

रविवार, 3 नवंबर 2013

बाधाओं में मुस्काना,

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
1
तुम दीपक
मन के ,जीवन के
तुम  हो मेरी आशा
तुम न होते
लिख न पाते हम
जन्मों की परिभाषा ।
2
दीपक बन
राह दिखाते जाना
बाधाओं  में  मुस्काना,
पथ में मिलें
उनको गिराकर
आगे न बढ़ जाना ।
3
ज्ञान -उजेरा
ढक लिया हाथों से
हे क्षुद्र साहित्यकार ?
'मैं-मै' का चढ़ा
जीवन में बुखार
इसे अब उतार ।
-0-
2- मंजु गुप्ता
1
मुडेरों पर 
घर -दर -अटारी 
चौराहों - नदियों  पे 
जलाएँ दीप 
समता - सद्भाव का 
विश्वबंधुत्व हेतु ।
-0-
3-रेनु चन्द्रा
1
ज्ञान के दीप
घर घर जलाएँ
अज्ञानता हो दूर
मन के दीप
राहों में सजा, प्यार 
बरसे भरपूर ।
2
मुस्कान भरो
फूलों की महक हो
दीपों की पाँत जले
रोशन करो
जन -जन के मन
प्रेम उत्साह पले ।

-0-