शुक्रवार, 13 जुलाई 2012

बनके प्रेम-घटा


8-डॉ जेन्नी शबनम
1
मन की पीड़ा 
बूँद -बूँद बरसी
बदरी से जा मिली  
तुम न आए 
साथ मेरे रो पड़ीं 
काली घनी घटाएँ !
2
तुम भी मानो 
मानती है दुनिया- 
ज़िंदगी है नसीब
ठोकरें मिलीं 
गिर -गिर सँभली
जिन्दगी है अजीब !  
3
एक पहेली 
उलझनों से भरी 
किससे पूछें हल ?
ज़िन्दगी है क्या 
पूछकरके हारे 
ज़िन्दगी है मुश्किल ! 
4
ओ प्रियतम !
बनके प्रेम-घटा 
जीवन पे छा जाओ 
प्रेम की वर्षा 
निरंतर बरसे
जीवन में आ जाओ !
-0-

बुधवार, 11 जुलाई 2012

सावन आया


1-रेनू चन्द्रा


सावन आया
उमड़ घुमड़ के
छाये नभ पे
काले काले बदरा
भूला शिकवे
मन -मयूर नाचा
सावन गीत
बूँदों के संग गाया
अनुरागी हो
मेघ जब बरसा
जन हर्षाया
पहन लहरिया
मन शर्माया
रंग रंगीला आया
सावन मन भाया ।
  -0-


स्नेह स्पर्श


तुहिना रंजन
1
मेरे सद्गुरु 
आशीष  बरसाते 
अंतर भिगो जाते 
शीश नवाए 
अँजुरी भी फैलाए
पीती जाती रस मैं! 
2
प्रीत की पाती 
लिखी होगी तुमने 
उफ़!! मगर आँसू  !
ऐसे निर्मम 
छलका दी अँखियाँ 
सब  ही धुँधलाया
3
स्नेह का स्पर्श 
मिटा देगा अँधेरे 
सब शिक़वे मेरे
पास तो आओ 
थाम लो मेरा हाथ 
मुझे छू लो-- जी जाओ !! 
4
खिला चमन 
लो फूली अमराई 
पियू- पियू की तान 
कोकिल की भी
देने लगी सुनाई 
बसंत  रुत आई  ।
5
अठखेलियाँ 
बूँदों की पत्तों संग 
शाखों की फूलों संग 
मन बावरा 
झूले में लेता पींगें 
बादलों को जा चूमे ।
-0-
डॉ सरस्वती  माथुर
1
दूर देश से
आते प्रवासी पाखी
अनजाने देश में
निहारें धरा
दीखते हैं व्याकुल
तलाशते बसेरा ।
2
टपकी बूँदें
सजा बंदनवार
धरा के हर द्वार
मन भिगोती
लय में टपकतीं
सावन के अँगना ।
3
सावन रुत
अल्हड -सा मौसम
बागों में जब आया 
झूले लरजे
ले ऊँची पींगे झूली
झूले पे सहेलियाँ ।
4
पावस रानी
सावन की डाल पे
मदमस्त है गाती
कजरी गीत

मिलके सहेलियाँ
बागों में सब आतीं 
5
डोलती यादें
पुरवाई के संग
मन के नभ पर
भटकती-सी
प्रियतम तरु से
लिपट  रह जातीं ।
-0-

मंगलवार, 10 जुलाई 2012

मेघ न आए


सेदोका -छह पंक्तियों की 5-7-7-5-7-7=38 वर्णक्रम की जापानी कविता है,जिसका प्रचलन  12 दशक से भी ज़्यादा पुराना है ।
-रामेश्वर काम्बोज हिमांशु
1-डॉ सुधा गुप्ता
1
गुलशन में
शाख़ो-शज़र वही
बहार की मस्ती भी
कसक यही
बस एक आशियाँ
शाख़ से टूट गिरा ।
2
मेघ न आए
आषाढ़ बीत गया
सावन रीत गया,
विरह-व्यथा
यक्ष किसे सुनाए
कैसे भेजे सन्देसा ?
3
बाग़ हरा है
फल-फूलों - भरा है,
है अकूत सम्पदा 
बाग़बाँ भूखा
करता रखवाली
न मिले रूखा -सूखा ।
4
पतझर में
वन-फूल खिला था
रंग-रूप मिला था
सही उपेक्षा
चलाचली की बेला
छूट गया अकेला ।
5
विरही यक्ष
बैठा विरहाकुल
कुटज- पुष्प लिये 
प्रतीक्षारत
मेघदूत  आ जाए
तो सन्देश पठाए !
-0-
2- रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
1

छुपा है चाँद
आँचल में घटा के
हुई व्याकुल रात
कहे किससे
अब दिल की बात
गिरे ओस के आँसू  ।
2
उमग पड़ी,
खुशबू की सरिता
पुलकित शिराएँ ।
‘ नहीं छोड़ेंगे’-
कहा जब उसने,
थी महकीं  दिशाएँ
3
लहरा गया
सुरभित आँचल,
धारा बनकरके
बहे धरा पे
सुरभित वचन ;
महका था गगन ।
4
बीता जीवन
कभी घने बीहड़
कभी किसी बस्ती में
काँटे भी सहे
कभी फ़ाक़े भी किए
पर रहे मस्ती में ।
5
तुमसे कभी
नेह का प्रतिदान
माँगूँ तो टोक देना
फ़ितरत है-
भला करूँ सबका
बुरा हो रोक देना ।
-0-
3-डॉ भावना कुँअर
1
काटे न कटे
पिया बिन ये रातें
पुकारे जब पीहू
मुश्किल जीना
करे किससे हम
दर्द लिपटी बातें।
2
तेज़ तूफान
हैं ढूँढती आसरा
वो नन्हीं -सी गौरैया
बचाए कैसे
इस मुश्किल घड़ी
अपने नन्हें प्राण।
-0-

आँचल -छाँव


1-डॉ ज्योत्स्ना शर्मा
1
मेरे मोहना
उस पार ले चल
चलूँगी सँभलके
दे  ज्ञान दृष्टि
मिटे अज्ञान सारा
ऐसे मुझे मोह ना ।
2
गीत बनेंगे
बस दो मीठे बोल,
सच्चे मीत बनेंगे
पथ में तेरे
उजियारे फैलाते
नन्हें दीप बनेंगे ।
-0-
2-सुशीला शिवराण
1
आँचल
-छाँव
मीठी नींद सो जाते
सपनों के गाँव से
आती परियाँ
देतीं खूब हिंडोले
वे स्मृतियों के झूले !
2
प्रसव-पीड़ा
भूली झट प्रसूता
देखा हसरतों से
उसका अंशी
आया नन्हा फ़रिश्‍ता
माहताब निशा का ।
3
गुड्‍डेगुड़िया
होता धूम से ब्याह
अलस दोपहरी
बाल-मंडली
खेला करती खेल
बसा दिलों में नेह।
4
मृगतृष्‍णा है
सजन तेरी प्रीत
दूर से भरमाए
पास जो जाऊँ
बस शून्य ही पाऊँ
यूँ मोहे भटकाए!
5
कारे बदरा
मड़-घुमड़के
बरसे जो जमके
पुलकी धरा
सौंधी माटी की खूश्‍बू
छाई मस्ती हरसू।
-0-

शुक्रवार, 6 जुलाई 2012

नीरांजना

डॉ सुधा गुप्ता

हे माँ शारदे!
तू मुझको तार दे
तेरी देहरी
आऊँ भाव-हार ले
वर बार-बार दे

माँ! तेरे द्वार
एक यही गुहार
तेरी बालिका
लिये शब्द-मालिका
तू उन्हें सँवार दे।

कई वर्ण के
खिले औअधखिले
फूल जो मिले
जैसे-जैसे गूँथे हैं
माँ! उन्हें स्वीकार ले!

आँखों के दीप
साँसों का नेह लिये
प्राणों की बाती
बनी है नीरांजना
अर्चना साकार, ले!
-0-

सावन- झड़ी


सुशीला शिवराण

सावन- झड़ी
भीगे गोरिया खड़ी
आओ साजन
तुम बिन सावन
जलाए जिया
पाँवों की पैंजनियाँ
हाथ-कँगना
नयनों का कजरा
केश-गजरा
माथे पर बिंदिया
होठों की लाली
सूना माँग सिंदूर
फटा बदरा
बह गया कजरा
बहा आलता

बह गई है हिना 
बहे नयन
आसमाँ भी उदास

सजन नहीं पास।
-0-

मंगलवार, 3 जुलाई 2012




बच्चे–सा हठी



सुभाष नीरव
1
रास्ते थे मेरे
कठिन तो बहुत
पर चला मैं
अपनी ही धुन में
मंज़िलों की तरफ़।
2
बेशक मिलीं
ठोकरें अनगिन
हार न मानी
बढ़ता रहा आगे
तभी पाईं मंज़िलें।
3
हँसें ज्यों फूल
काँटों में रहकर
दु:ख-सुख में
हम भी हँसे वैसे
महका लें जीवन।
4
पत्ता -पत्ता भी
झूम उठा पेड़ का
डालियों पर
फुदक कर जब
पंछी चहचहाए।
 5

कौन टिकेगा ?
ले झूठ का सहारा
उसके आगे
जो उठाए खड़ा है
सत्य का परचम।
6
बच्चेसा हठी
छोड़ता न अँगुली
ये दु:ख कभी
संग-संग चलता
जीवन-सफ़र में।
-0-

शुक्रवार, 29 जून 2012

संतान- सुख



ज्योतिर्मयी पन्त

वे झुके काँधे
हाथी घोड़े बने  जो  
अंगुली थामें
चलाया  खड़ा किया 
शब्द बोलना
भावी सुख हित वे
बोझ सर पे 
जिम्मेदारियाँ सदा
ख़ुशी से लिए
हँसी किलकारी पे 
करते रहे
निछावर दिन रैन
हुए निहाल
समय करवट
झुके वे काँधे
झुर्रियाँ भरे मुख
चलें न बोलें
व्यर्थ- सा हो जीवन
आस लगाए
खोजें अपनापन
बच्चे अपने
हँसे बोले उनसे
हाथ थाम लें
चमकती लौ जैसे
क्षीण दीये में
भरें उत्साह -ओज
 संजीवनी दें
पुनर्जीवन मिले
 संतान सुख मिले ।
-0-

गुरुवार, 28 जून 2012

तेरी कोख


रचना श्रीवास्तव

तेरी कोख में
आने से पहले ही
सोचा ,क्या बनू ?
बेटी बन के  चलूँ
साथ निभाऊँ
या रोड़े अटकाऊँ
बन के बेटा l
बनू तेरी ही जैसी
स्नेह की  मूर्ति
लिया निर्णय मैने l
सुन के यह
जालिम है दुनिया
कहा सभी ने ,
नोच लेंगें  ये तेरी
नन्ही सी सांसें
दम तोड़ेगी सभी
अभिलाषाएं
अपनों के ही हाथों
लुटेगी सदा
तुझ पे था  यकीन
मुस्कुराई मै
बन  बिटिया तेरी
कोख में आई 
मेरे आने के  चिह्न
दिखे तुझमें
ख़ुशी से नाची तुम 
पिता भी खुश
जब डाक्टर बोला
है कन्या भ्रूण
चेहरे पे  शाम थी
घर में दुःख
मै थी  अभिशापित l
अन्दर  आया
जहरीला -सा धुँआ
चुभने लगा
बहुत कष्ट हुआ
अम्मा  मै रोई
तुझे पुकारा मैने
दुहाई भी दी
पर धुंआ न रुका
नन्हे से हाथ
अकड़ने लगे है
पकड़ ढीली
आवाज में शिकन
होने लगी है
क्या वो लोग सच्चे  थे ?
मै  थी गलत
क्या ये   पाप था ,मेरा
लड़की होना ?
तू भी तो औरत है
फिर ऐसा क्यों ?
जिस लोक से आई
उसी को चली
अच्छा हुआ न जन्मी
इस भूमि पे
क्या पता बन कर,
औरत मै भी
हत्या बेटी की करती
ओ माँ शुक्रिया
तूने मुझे बचाया
इस महा  पाप से
 -0-