रविवार, 8 अप्रैल 2012

नदी में चाँद


नदी में चाँद ( ताँका )

डॉ अनीता कपूर
1
नदी में चाँद
तैरता था रहता
पी लिया घूँट
नदी का वही चाँद
 हथेली पे उतरा



2
शहर मेरा
मुरझा गया कुछ
चलो सींच दें
डाले इंसानियत
और प्यार की खाद ।
3
धुला चाँद- सा
आसमाँ का चेहरा
हँसा बादल
निखरा -निखरा -सा
बरसात के बाद ।
4
वो छूटे लम्हे
समेटे लिए मैंने
हो कर लीन
जिऊँ उन्हें दोबारा
जो हो  साथ तुम्हारा ।
5
दिलो- दिमाग
किया आत्म-मंथन
कशमकश
हुई प्रक्रिया पूरी
मिटी रिश्तों की दूरी ।
6
दौड़े शहर
रेलगाड़ी हो जैसे
लटके हम
जिंदगी को पकड़ें
जैसे गोद में बच्चा ।
7
मत उलझो
जीवन से अपने
सुलझा इसे,
डूबकर शून्य में
कहीं खो न हो जाओ ।

8
फिर बसंत
आया देने है फूल
झोली फैलाओ
धरती की चादर
सतरंगी बनाओ

9
देतीं ऋतुएँ
अपने बदन से
तोड़के फूल
हरे पत्तों की थाली
सजी छटा निराली ।
10
रिश्तों को पोतो
प्रेम के रंग ही से
ढह न जाये
दीवारें प्यार -भीगी
खाएँ नही चुगली ।
11
ज़िदगी रूई
मत बनाओ भारी
डुबाके इसे
दुखों वाले पानी में,
उड़ाओ आसमाँ में ।
12
रिश्ते पंछी -से
पकड़ो जो  सख्ती से
ये उड़ जाएँ,
सहलाओ प्यार से
तुम्हारे पास आएँ ।
13
कच्ची धूप से
खिले अजब रिश्ते
पकाओ धूप
औ’ प्रेम की आँच में
फिर चमकें  रिश्ते
-0-

7 टिप्‍पणियां:

amita kaundal ने कहा…

अनीता जी सभी तनका एक से बढकर एक हैं इक ही तारीफ़ करुँगी तो दूसरे से न इंसाफी होगी बहुत सुंदर भाव हैं बधाई............
सादर,
अमिता कौंडल

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

दो-तीन दिनों तक नेट से बाहर रहा! एक मित्र के घर जाकर मेल चेक किये और एक-दो पुरानी रचनाओं को पोस्ट कर दिया। लेकिन मंगलवार को फिर देहरादून जाना है। इसलिए अभी सभी के यहाँ जाकर कमेंट करना सम्भव नहीं होगा। आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि-आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी होगी!

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बहुत सुंदर तांका .... रिश्तों की अहमियत को कहते हुये

प्रियंका गुप्ता ने कहा…

सभी ताँके बहुत अच्छे लगे...मेरी बधाई...|
प्रियंका

डॉ. जेन्नी शबनम ने कहा…

सभी ताँका बेहतरीन. ये खास अच्छा लगा और इसके बिम्ब भी बहुत अनूठे...
दौड़े शहर
रेलगाड़ी हो जैसे
लटके हम
जिंदगी को पकड़ें
जैसे गोद में बच्चा ।

बहुत शुभकामनाएँ.

अनाम ने कहा…

एक से एक सुन्दर ताँका खूबसूरत भाव....बधाई हो।
कृष्णा वर्मा

Devi Nangrani ने कहा…

शहर मेरा मुरझा गया कुछ चलो सींच दें डाले इंसानियत और प्यार की खाद ।
अनीता जी की कलम के तेवर शब्दों से झांक रहे हैं। अति सुंदर अक्स आँखों में उतारा आए हैबधाई व शुभकामनाएँ