मंगलवार, 12 नवंबर 2013

तेरा मिलन




डॉ हरदीप कौर सन्धु
तेरा  मिलन
सुना जाता है मुझे
हर पल ही
अनकहा -सा दर्द
बहता रहा
जो तेरी अँखियों से
निचौड़ी गई
अधूरे अरमान
कठिन राह
अब कहाँ से लाऊँ
पी खींचती 
कोई जादुई दवा
धीरे -धीरे से
तेरे खुले ज़ख्मों पे
रखने को मैं
उठी बिरहा -हूक
बेनूर हुई 
लबों पे आ लौटती
काँटों चुभती
तीखी -सी टीस ने
हौले -हौले ही
समय की तल पे
यूँ  फ़ाहे रख
खुद ही हैं भरने 
तेरे दिल  के 
अक औ असह्य 
गहरे  दर्द- ज़ख्म !
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5 टिप्‍पणियां:

विभा रानी श्रीवास्तव ने कहा…

खूबसूरती से सच बयान हुई कि
समय से बड़ा कोई मलहम नहीं
अद्धभुत अभिव्यक्ति

ज्योति-कलश ने कहा…

मर्मस्पर्शी चोका ....
अब कहाँ से लाऊँ
पीर खींचती
कोई जादुई दवा.......बहुत सुन्दर रचना ..बधाई ...हरदीप जी !

डॉ. जेन्नी शबनम ने कहा…

कुछ पीर की दवा होती ही नहीं, वक़्त का मरहम ही धीरे धीरे.....
बहुत खूबसूरत अलफ़ाज़...

अब कहाँ से लाऊँ
पीर खींचती
कोई जादुई दवा
धीरे -धीरे से
तेरे खुले ज़ख्मों पे
रखने को मैं

भावपूर्ण चोका के लिए हरदीप जी को बधाई.

Pushpa mehra ने कहा…

bahan hardeep ji apake dwara likha gaya choka sargarbhit hai.
pushpamehra.

राजीव कुमार झा ने कहा…

बहुत सुन्दर .
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