गुरुवार, 18 जून 2015

बादलों की चादर



1-कृष्णा वर्मा
1
हैं मजबूर
नाज़ुक कल्पनाएँ
टकराएँ जो
सत्य की शिलाओं से
होतीं चकनाचूर।
2
उपयोगी है
विध्वसंक आग भी
निष्ठा तुम्हारी-
करो यज्ञ ,या देखो,
घर -फूँक तमाशा।
3
पल का क्रोध
इल्ज़ामों की बौछार
करे ज़ुबान,
मृत्यु से कठिन है
भयानक हो जीना।
4
पानी की बूँद
गिरे जलज पात
मोती- सी लगे
गिर जाए ताल में
खो देती पहचान ।
5
बुझे न कभी
उम्मीदों के दीपक
सीख लिया है
जब से कतरना
हवाओं के पंखों को।
6
घर ,न मकाँ
है ठौर ,न ठिकाना
रहे जहाँ भी
फितरत दीप की
रौशनी ही लुटाना।
7
उभरे यदि
कतरा कोई आज
इतराकर
सागर के सुर में
 करता है वो  बात।
8
करे जो काम
खिलौनों की दुकान
जाने वो बच्चा-
क्यों टूटें अरमान
क्या होती है घुटन ।
-0-
2-अनिता मण्डा
1
भरी हुई है
बादलों की चादर
सलवटों से
बिछाकर इसको
सोये हैं चाँद तारे
2
राह देखती
खड़ी छलनी लिये
व्रती नारियाँ
हटा बादल ओट
नियत में क्यों खोट।
3
विरही काटे
चाँद की खुरपी ले
सारी रतियाँ
तारों की फ़सल को
नींद नहीं अखियाँ।
4
रात आती है
चाँद का ख़ंजर ले
क़त्ल करने
बैठ यादों की ओट
बचाई जान मैंने।
5
आओगे तुम
दिल को समझाया
राहें निहारी
कानों में पहन के
आहटों का सागर।
6
ओढ़ निकली
कोहरे की चादर
उनींदे नैन
अलसाई-सी भोर
ढूँढ़ें धूप का छोर
-0-

16 टिप्‍पणियां:

मेरा साहित्य ने कहा…

उभरे यदि
कतरा कोई आज
इतराकर
सागर के सुर में
करता है वो बात।
sunder bimb hai

भरी हुई है
बादलों की चादर
सलवटों से
बिछाकर इसको
सोये हैं चाँद तारे ।
bahut khoob
badhai aapdono ko
rachana

अनिता मंडा ने कहा…

आपने मेरी रचना को यहाँ स्थान दिया।हृदय से आभार।

Unknown ने कहा…

शाश्वत सत्य को उजागर करते ताँका। … बहुत सुंदर शब्द संयोजन। … घर न मकाँ /है ठौर ,न ठिकाना /रहे जहाँ भी फितरत दीप की /रौशनी लुटाना। … पानी की बूँदे /गिरे जलज पात /मोती सी लगे /गिर जाये ताल में /खो देती पहचान।
कृष्णा वर्मा जी … यह और भी बढ़िया लगा। … उपयोगी है /विध्वंशक आग भी /निष्ठा तुम्हारी /करो यज्ञ या देखो /घर फूँक तमाशा। बहुत बहुत वधाई

अनीता मंडा जी क्या खूब कल्पना की। … राह देखती /खड़ी चलनी लिए /व्रती नारियाँ /हटा बादल ओट /नियत में क्यों खोट। यह और भी बढ़िया। … आओगे तुम /दिल को समझाया /राहें निहारी /कानों में पहन के आहटों का सागर।
दोनों रचना कारों को बहुत वधायी। त्रिवेणी के संपादक को भी बहुत वधाई इतनी सुंदर रचनाएँ पाठकों तक पहुँचाने के लिए

Amit Agarwal ने कहा…

बेहद ख़ूबसूरत रचनाएँ!
कृष्णा जी, अनिता जी अभिनन्दन!

Pushpa mehra ने कहा…

krishna ji va anita ji bhavbhare tanka prastut karane hetu badhai.
pushpa mehra.b

Anita Lalit (अनिता ललित ) ने कहा…

बहुत सुंदर भावपूर्ण, साथ ही सीख भी देते हुए ताँका आदरणीया कृष्णा दीदी के -बहुत अच्छे!
ख़ूबसूरत चाँद के मनमोहक रूप... बहुत ही प्यारे अनीता जी !

आप दोनों को हार्दिक बधाई !

~सादर
अनिता ललित

ज्योति-कलश ने कहा…

यूँ तो सभी तांका बहुत सुन्दर हैं ..लेकिन ..'दीप की फितरत' और 'पानी की बूँदें ' अनुपम हैं कृष्णा दी ..हार्दिक बधाई ..सादर नमन !

बदल की चादर ..और ... 'चाँद का खंजर ' बहुत सुन्दर हैं अनिता जी ..आपको सौ-सौ दुआएँ ...बहुत शुभ कामनाएँ !!

अनिता मंडा ने कहा…

आपकी दुआओं से दामन भरा रहे,इसी चाहत के साथ सबका बहुत बहुत शुक्रिया।

kashmiri lal chawla ने कहा…

दोनों रचनाएँ बिंबो से भरपूर ! बधाई !

त्रिवेणी ने कहा…

हिन्दी हाइकु के पुरोधा डॉ भगवतशरण अग्रवाल जी की मेल से प्राप्त टिप्पणी
From: Bhagwatsaran Agarwala [mailto:bhagwatsaranagarwala@gmail.com]
Sent: Thursday, June 18, 2015 10:16 AM
To: SHABDONKAUJALA
Subject: Re: आज त्रिवेणी में कृष्णा वर्मा और अनिता मण्डा के ताँका

Anita manda me taanka pasand aae.badhai. b s agarwala




सविता अग्रवाल 'सवि' ने कहा…

कृष्णा जी सुन्दर शब्दों से रचे सुन्दर तांका के लिए हार्दिक बधाई |उपयोगी है विध्वंशक आग भी...... बहुत गहरे भावपूर्ण है |अनीता जी आपके भी सभी तांका सुन्दर हैं |हार्दिक बधाई |

Jyotsana pradeep ने कहा…


bahut sunder taanken A!'deep ki fitrat' tatha' paani ki boond' ne man moh liya krishna ji .
'badal ki chadar' aur chaand ka khanjar' anupam hai anita ji ...aap dono rachnakaron ko dhero shubhkaamnayen .

Dr.Bhawna ने कहा…

हैं मजबूर
नाज़ुक कल्पनाएँ
टकराएँ जो
सत्य की शिलाओं से
होतीं चकनाचूर।

Bhaut sundar ! bahut bahut badhai...

Dr.Bhawna ने कहा…

ओढ़ निकली
कोहरे की चादर
उनींदे नैन
अलसाई-सी भोर
ढूँढ़ें धूप का छोर।

Bahut achha ! shubhkamnaye...

रमेश गौतम, बरेली ने कहा…

मार्मिक रचना के लिए बधाई एवं शुभकामनाएं

प्रियंका गुप्ता ने कहा…

पल का क्रोध
इल्ज़ामों की बौछार
करे ज़ुबान,
मृत्यु से कठिन है
भयानक हो जीना।
कितनी सच्ची बात...पर बेहद तकलीफदेह होता है ऐसे सच को जीना...| हार्दिक बधाई...|

विरही काटे
चाँद की खुरपी ले
सारी रतियाँ
तारों की फ़सल को
नींद नहीं अखियाँ।

क्या बात है ! अति सुन्दर...हार्दिक बधाई...|