गुरुवार, 10 अक्टूबर 2013

भीतर का रावण


सुदर्शन रत्नाकर

नहीं मरता
जीवित है रहता
हर दिल में
बसता है रावण
व्यर्थ है जाता
चाप पर चढ़ता
बाण राम का ।
पुतला है जलता
हर मन में
रावण है हँसता
छोड़ जाता है
अपने वंश -बीज
पोषित होते
पनपते रहते ।
झूठ -फ़रेब
लालच -भ्रष्टाचार
राम बाहर
रावण है भीतर
कैसे मरेगा?
राम – वनवास भी
कभी ख़त्म न होगा ।

-0-

4 टिप्‍पणियां:

Krishna ने कहा…

दुनियावी सच को कहता प्रभावपूर्ण चोका.....बधाई सुदर्शन जी !

प्रियंका गुप्ता ने कहा…

इस रावण को हमें सबसे पहले खुद के भीतर ही मारना होगा...|
सामयिक, प्रभावपूर्ण चोका के लिए बहुत बधाई...|


प्रियंका

बेनामी ने कहा…

ek samyik rachna, aaj sirf prateekatmak hi nahin varan sach me kuch karne ki avashyakta hai

ज्योति-कलश ने कहा…

बहुत सामयिक ...सार्थक सन्देश देता चोका ...बहुत बधाई !!