मंगलवार, 20 अगस्त 2013

उम्र लगे मेरी

1-डॉ सुधा गुप्ता
1
‘अमरस’ अँगनाई में
कोयल कूक रही
अब तो अमराई में ।
2
बहना अब आएगी
सुख-दु:ख की बातें
हिलमिल बतलाएगी ।
3
वो राखी लाएगी
भैया के माथे
हँस तिलक लगाएगी ।
4
दस दिन रह जाएगी
झोली भर खुशियाँ

घर को दे जाएगी।
5
भैया का यह कहना-
यह घर भी तेरा
तू इस घर का गहना ।
6
ये बंधन हैं मीठे
सब रस जीवन के
तेरे बिन हैं सीठे
-0-

 2- डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा 
1
दिन राखी का भैया 
बहना राह तके
शुभ-तारों की छैंया
2
यूँ नर्म हवाएँ हैं 
खुशियों के आँसू 
औ' लाख दुआएँ हैं
3
नयनों से दूर भले 
रेशम का धागा
मन से मन बाँध ,खिले
4
बदरी तो जा बरसे 
सुन भैया ,बहना 
राखी पे क्यों तरसे
5
जा डाल हवा फेरी 
भैया से कहना -
खुशियाँ चाहूँ तेरी
6
भैया ! भाभी प्यारी 
चमन खिले सारा 
घर , आँगन ,फुलवारी
7
महका -महका -सा मन 
उम्र लगे मेरी 
हो स्वस्थ सुखी जीवन
8
ये पल अनमोल रहे 
मुझपे क्या जो दूँ
बस मीठे बोल रहे
9
लो भोर विभोर हुई 
हर्षित विटप , किरन 
राखी की डोर हुई
-0-

भाई है दूर

सुदर्शन रत्नाकर

भाई है दूर
आने में मज़बूर
छोटी बहना
राह है निहारती
आएगा भाई
सूनी -सूनी आँखों में
जलाए बैठी
दीपक आशाओं के
नेह के तार
करते इंतज़ार
कब आओगे
राखी बँधवाओगे
सीमा पास से
संदेश भिजवाया -
मुझे याद है
राखी का त्योहार है
दूर हूँ तो क्या
मन तेरे पास है
मेरी बहना
मैं बहुत ही जल्दी
घर आऊँगा
राखी बँधवाऊँगा
वह दिन भी
त्योहार हो जाएगा
परिस्थितियाँ
बदलती रहतीं
एक पल भी
उदास मत होना
मेरी नन्ही बहना ।

-0-

गुरुवार, 15 अगस्त 2013

भटकी है आज़ादी

कृष्णा वर्मा
1
भटकी है आज़ादी
नीयत खोटी औ
देह रे है खादी।
2
कैसी आज़ादी है
अपने लूट रहे
घर की बरबादी है।
3
डर तुम फैलाते हो
अपने ही घर में
खुद आग लगाते हो।
4
कुर्बानी भूल गए
बेटे माँओं के
फाँसी पर झूल गए।
5
वीरों का रक्त बहे
आज़ादी पाने को
क्या-क्या जुल्महे
6
जो देश बचाते हैं
दुश्मन की गोली
सीने पर खाते हैं।




सबकी चिंता है

शशि पुरवार 
1
कैसी आजादी थी
भू का बँटवारा  
माँ की बर्बादी थी।

सरहद पे रहते है 
उनका दुख पूछो
वे क्या -क्या सहते हैं।
3
बतलाऊँ कैसे मैं 
सबकी चिंता है
घर आऊँ कैसे मैं ?
4
हैं घात भरी रातें
बैरी करते है
गोली की बरसातें।
5
प्रेम भरी ये बोली
दुश्मन क्या जाने
खेले खूनी होली
6
स्वर सारे गुंजित हो
गूँजे जन -गन -मन
भारत सुख रंजित हो।

-0-

कर अभिनन्दन

सबको स्वाधीनता दिवस की असीम शुभकामनाएँ !
सम्पादक द्वय
-0-
डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा 
1
रे कवि मन 
बस अब वीरों का 
कर अभिनन्दन 
भाए न मुझे 
बिंदिया या कजरे 
कंगन का वंदन ।
2
लें केसरिया 
गूँज उठे धरती 
केसरी -सा गर्जन 
जागें जो सोए 
शावक सिंहनी के 
डरे, विद्रोही मन ।
3
धवल कान्ति 
बने मन निर्मल 
सौम्य शांत उज्ज्वल 
तिरंगा मेरा 
जग में फहराए
सुख -शान्ति बढ़ाए ।
4
क्षमा सहेजें 
अनाचार गद्दार 
कभी नहीं स्वीकार,
उग्र तेज से 
रहे दीपित माथा 
लिखें गौरव गाथा ।
-0-


सोमवार, 12 अगस्त 2013

कौन यहाँ पराया ?

  
1. अपना - पराया-सुभाष लखेड़ा
 कौन अपना
कौन यहाँ पराया
कैसे बताऊँ 
चेहरे के भावों को 
कैसे छुपाऊँ
नाराज मत होना
मुझे न आता 
अभिनय करना 
झूठ को सच
और सच को झूठ
बनाते कैसे  
आता नहीं है मुझे
दिल दुखाना
बातों को उलझाना  
मुझे आता है - 
हँसना -मुस्कराना
दर्द बाँटना 
सच बात करना
धोखा न देना 
अपना या पराया
कौन है यहाँ
न पहले पता था 
न ही आज पता है।
-0-
2.  धर्म का मर्म 

इंसानियत
सबसे बड़ा धर्म
यदि समझो 
इसमें छुपा मर्म
ईश्वर कहे
तुम सब मेरे हो 
भाई -भाई हो
फिर क्यों लड़ते हो 
क्या मिलता है
यूँ खून बहाने में
एक दूजे का 
कौन -सा धर्म कहे 
अन्याय करो 
कौन- सा धर्म कहे
अन्याय सहो 
कृष्ण ने यही कहा-
पाप से लड़ो 
लड़ना जरूरी हो 
तो असमंजस क्यों।
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पुष्पा मेहरा के माहिया
1
तूफ़ाँ जब हैं आते
मन जग का रोता
सपने भी खो जाते।
2
मन छल-छलके जातीं
सब बातें मन की
रग-रग को तड़पाती ।
3
जीवन का रस पी लें
दो पल का मेला
आओ हँसके  जी लें

-0-

शुक्रवार, 9 अगस्त 2013

मन का दर्द-रिश्ता

प्रियंका गुप्ता के दो चोका
1- मन का दर्द


जब भी कभी
दरकता है दिल
सुने न कोई
उसकी चटकन
किसी को कोई
फ़र्क नहीं पड़ता
अपना दुःख
सर्वोपरि होता है
हर रिश्ते में
तेरे मेरे फ़ासले
बँटे हुए से
दुखवा कासे कहूँ
सोचे है मन
तलाशता फिरे है
थोड़ी सी छाँव
ताकि कुछ पल को
राहत पा ले
कड़ी-तीखी धूप से
आँखों की नमी
भाप सी उड़ जाती
जग के आगे
सूखी आँखें लेकर
लब मुस्काते
कह कर क्या होगा
मन की व्यथा
छिपा अपने दर्द
हँसते रहो सदा
-0-
2-रिश्ता

कहा था तूने
चलूँगा साथ तेरे
इस छोर से
उस छोर तलक
हर रुत में
रुकूँगा न थकूँगा
संग रहूँगा
मौसम जो बदला
वादा है टूटा
कड़ी धूप में देखो
रिश्ता बदला
कल जो था अपना
आज पराया
छोड़ के गया जो तू
फिर न आया
नैना राह निहारे
भरमाए-से
सच को स्वीकारना
मन न माने
हर रिश्ते की यही
होती कहानी
दुःख मनाऊँ तो क्यों
यही तो ज़िन्दगानी ।

-0-

मंगलवार, 6 अगस्त 2013

मन-दर्पण जैसा

अनिता  ललित 
1
पीछे आग सुलगती
आगे राह धुआँ
जीवन-आस न जगती!
2
रोती बेबस आँखें
कहतीं करुण कथा
साँसें गरम सलाखें !
3
समझा जिसको अपना
मन-दर्पण जैसा
निकला टूटा सपना !
4
रिश्ते भी हैं फ़ानी
सूखे दरिया से
छलके कैसे पानी!
-0-

शुक्रवार, 2 अगस्त 2013

तेरी बाट निहारें

कमला निखुर्पा
1
मेले में खोई -सी 
यूँ लगता मुझको 
हँसके फिर रोई-सी ।
2
अपना- सा लागे है
आवारा बादल  
नभ में जब भागे  है ।
3
हमसे तो लाख भले
पंछी अम्बर के
जब चाहे देश चले  
4
तेरी बाट निहारें
दो बेचैन नयन
सपनों को पुकारें
5
उड़ चल ऐ मेरे मन
कितना फैला है !
ये सुधियों का आँगन
6
बैरन आज उदासी
इसके ही कारण
मेरी निंदिया प्यासी

-0-

दिन बीते अँधियारे

शशि पाधा
1
वीणा के तार बजे
काँपे अधरों पे  
सुर -सरिता आन सजे 
2
पावस की वेला है
पाहुन आन खड़े
रिमझिम का मेला है ।
3
दिन बीते अँधियारे
ऊषा द्वार खड़ी
बाँटे सुख-उजियारे ।
4
किरणें बिखराने दो
बंद झरोंखों से
सूरज को आने दो
5
भीनी -सी गंध उड़ी
कलियों को छूने
भँवरों की पाँत जुड़ी ।
6
लो चाँद बुला लाएँ
लहरों का पलना
कुछ देर झुला लाएँ ।
7
कितनी मजबूरी थी
सागर -सरिता में
मीलों की दूरी थी ।
8
चूड़ी तो मौन रही
पायल छनक गई
जब तूने बाँह गही ।
9
काहे भरमाते हो
खुशबू कह देती
क्यों छिप के आते हो ।
10
सरगम भी वजने दो
हमको सपने -सा
पलकों में सजने दो ।

-0-