रश्मि विभा त्रिपाठी
शनिवार, 26 फ़रवरी 2022
शुक्रवार, 25 फ़रवरी 2022
1025-मन बावरा
प्रीति अग्रवाल
1.
मन बावरा
लाख जतन करूँ
समझ न पाए
इत उत क्यों डोले
ये सब्र क्यों न पाए!
2.
एकाकीपन
भयानक विपदा
बड़ी त्रासदी
उपचार सरल
सप्रेम, सद्भावना।
3.
भँवरे की गुंजन
या सरसराहट
पत्तों की जैसे
यूँ कानों में कहते
तुम मीठी बतियाँ।
4.
माँगके देख
सब कुछ मिलेगा,
नारी केवल
माँगे अपनापन,
प्रेम और सम्मान!
5.
तुमने किया
इज़हार प्रेम का
झूमा यूँ दिल
रुक गई ज़मीन
झुक गया आसमां।
6.
दान में मोती
दिए होंगे ज़रूर
तुम्हें जो पाया
अलबेला सजन
जीवन अनमोल।
7.
जीवन एक
अनबूझ पहेली
बांच न पाऊँ
क्यों न मैं पानी बन
बस बहती जाऊँ।
8.
कौन हो तुम
अपने से मुझको
लगते हो क्यों
क्या पहले मिले हैं
क्या पुराने हैं साथी?
9.
चारों ही ओर
है चहल-पहल
मन क्यों खाली
किसको है खोजता,
आखिर क्या चाहता?
10.
छिल जाते हैं
पथरीली राहों में
नदी के पाँव
बस एक ख़याल
सागर देखे राह!
11.
रतिया सारी
तारों को गिन गिन
हमने काटी
जो रह गए कल
वो आज गिन लेंगें !
-0-
बुधवार, 23 फ़रवरी 2022
गुरुवार, 27 जनवरी 2022
शनिवार, 15 जनवरी 2022
गुरुवार, 13 जनवरी 2022
1021-चैन की साँस
ताँका-प्रीति अग्रवाल
1.
तोड़ी हमने
रूढ़ियों की बेड़ियाँ
चैन की साँस
खुला, नीला आकाश
कुछ और न चाह!
2.
अधीर-सा है
आज फिर ये मन
ढूँढ रहा है
कुछ प्रश्नों के हल
कुछ सुकूँ के पल।
3.
आखिर क्या है
प्रेम की परिभाषा
कोई न जाने
राधा, मीरा, पद्मिनी
सीता या यशोधरा?
4.
स्कूल, कॉलेज
जीवन-पाठशाला
सब पे भारी
चुन-चुन दे शिक्षा
ज्ञान भरी पिटारी।
5.
बत्तू है चाँद
मीठी-मीठी बतियाँ
रोज़ सुनाए
न मुझे ही सोने दे
न खुद सोने जाए।
-0-
1020-कर्मयोगी पिता
सेदोका- रश्मि विभा त्रिपाठी
1
पिता तुमने
बनके कर्मयोगी
परपीड़ाएँ भोगी
तुम्हारी सुधि
क्या उन्हें आती होगी
वे 'कृतघ्नता- रोगी'।
2
तुमने छोड़ा
जबसे मेरा हाथ
विप्लव दिन- रात
झेल रहे हैं
प्रतिपल आघात
प्राण- मन औ गात।
3
बीत गए हैं
कई माह औ साल
कितनी मैं बेहाल
क्यों न आए
पिता की तस्वीर से
प्राय: पूछूँ सवाल।
4
विचर रहे
दूरस्थ दिव्य लोक
देखें जो आते शोक
प्राय: पिता के
अभ्यर्थना के श्लोक
देते दु:ख को रोक।
5
जबसे गए
जीवन- उपवन
नीरव औ निर्जन
किंतु पिता का
मंगलाकांक्षी मन
होने न दे उन्मन।
6
शुभाशीष के
बरसाएँ सुमन
स्वर्ग से हो मगन
प्यारे पिता का
करुणाकारी मन
करे धन्य जीवन।
7
तुम तक क्या
कोई जाती है राह
पूछ रही है आह
तुम्हारे बिन
पिता जग में कैसे
अकेले हो निबाह।
8
तुम सर्वज्ञ
और हो अगोचर
रहे सदा तत्पर
रखते ध्यान
मेरा प्रति पहर
मुझे व्यापे न डर।
9
घड़ी दु:ख की
मुझपर जो बीती
औ जिजीविषा रीती
आशीष-सुधा
पिता उड़ेलें, पीती
पुनि तभी मैं जीती।
-0-
सोमवार, 10 जनवरी 2022
1019-समय-चक्र
डॉ. सुधा गुप्ता
1
समय-चक्र
जीवन-अरगनी
सुख-दु:ख लटके,
धोते-सुखाते
कभी मुस्कान खिली
कभी आँसू टपके।
2
इतनी पीड़ा!
रुदन भी खो गया
अचरज बो गया,
सूखी आँखों में
बस जलन बाकी
हर साथी खो गया।
-0- (सभी चित्र गूगल से साभार
गुरुवार, 6 जनवरी 2022
1018-आशाओं की उड़ान
रश्मि विभा त्रिपाठी
1
ये अँधियारे
प्रिय! छँट जाएँगे
कितना सताएँगे
हम धैर्य के
दीपक जलाएँगे
दीप्ति- गीत गाएँगे।
2
उपयुक्त है
केवल मन- प्रांत
जहाँ मिले एकांत
आरम्भ करें
अनुराग- वृत्तांत
आओ आसन्न कांत।
3
प्रिय ने दिया
अतुल्य पाँख-दान
और प्रतिष्ठा-मान
भर रही हूँ
आशाओं की उड़ान
'छुऊँ मैं आसमान'।
4
किंचितमात्र
गला न पाएँ दाल
वैरी बड़े बेहाल
प्रिय बनके
मेरी श्वासों की ढाल
काटें कुल जंजाल।
5
हरकारा दे
अनुभूति तत्काल
मैं जो होऊँ बेहाल
अलि! आ काटें
प्रिय पीड़ा- जंजाल
दुआ- दीप दें बाल।
6
वहन करे
मेरा जीवन-भार
भूलूँ न उपकार
बड़े भाग से
डूबी, उबरी, पार
प्रीति खेवनहार।
7
प्रवहमान
मन- गंगा प्रेमिल
भाव- वीचि फेनिल
मैं प्रिय संग
डूबी तो गया मिल
अनुराग अखिल।
8
प्रियवर का
प्रार्थना का प्रयोग
लाया है शुभ योग
मैं मुक्त हुई
निरस्त अभियोग
निर्वासित वियोग।
9
कदाचित हो
संकट से सामना
प्रिय निश्चलमना
आलिंगन में
कस पिघला देते
अवसाद ये घना।
10
क्रूरतापूर्ण
करें शर- संधान
कष्ट औ व्यवधान
प्रीति प्राणदा
फूँके मुझमें जान
प्राण- मानस त्रान।
बुधवार, 29 दिसंबर 2021
1017-मन्दाकिनी- सा मन
सेदोका- रश्मि विभा त्रिपाठी
1
पीयूषवर्णी
देखूँ वे दो नयन
देते तृप्ति का धन
प्राणप्रिया का
मन्दाकिनी- सा मन
मुक्त अवगाहन।
2
मंत्रमुग्ध हो
मन रहा थिरक
राग मनमोहक
प्राणप्रिया के
शब्द भरें अथक
शिराओं में खनक।
3
खिल उठे हैं
सुन उनकी बात
श्वास-मानस-गात
प्राणप्रिया का
स्वर ज्यों पारिजात
'सौरभ का प्रपात'।
4
प्रिय ने धागा
न्यारा नेह का बाँधा
न दूरी बनी बाधा
एक ही मन
बरतें आधा- आधा
मानो श्री कृष्ण- राधा।
5
प्रिय रहते
दूर होके भी साथ
सुनें मन की बात
प्रवहमान
प्रणव का प्रपात
परे पीड़ा- उत्पात।
6
मेरी दशा का
अलि वे अनायास
कर लेते आभास
आ हिमांशु- से
अंक भरें उजास
ओझल तम- त्रास।
7
अलि उनका
प्रार्थना का प्रक्रम
अक्षुण्ण, नहीं कम
विधि- परीक्षा
मेरी श्रेणी- प्रथम
'प्रिय का परिश्रम'!
8
प्रिय आलम्ब
आशाएँ जीर्ण-शीर्ण
होने न दें विदीर्ण
हारूँ तो करें
जय- सूत्र उत्कीर्ण
रटूँ, होऊँ उत्तीर्ण।
9
प्रिय तुमसे
मुझे हुआ संप्राप्य
सर्वसुख- साम्राज्य
सगर्व झूमूँ
मिटी पीड़ा असाध्य
सराहूँ निज भाग्य।
10
बैठी हुई थी
मैं अवसाद लिये
पीर अगाध लिये
प्रिय आ गए
आस- प्रसाद लिये
औ प्राण साध लिये।
11
प्रिय की दुआ
दे ऋतु को बदल
दुख जाए पिघल
प्राण- पुष्कर
साँसों में परिमल
सुख- नीलकमल।
-0-
सोमवार, 27 दिसंबर 2021
1016
राजेन्द्र वर्मा
1
पौ फट रही,
गुलाबी होते जाते
उषा के गाल,
सरका मुख-पट
झाँकने लगा सूर्य ।
2
दुःख टँगा है
देह-अलगनी पे,
मन है खाली ।
रिश्तों के मेघ झरें,
टपके सूनापन ।
3
मेघ झरते
रिमझिम-रिमझिम
एक लय में,
बज रहा सितार,
मुग्ध रविशंकर !
4
चटख धूप,
घर से निकली है
वीर बहूटी।
लाल दुशाला डाले
कौन देश को जाती ?
5
पवन नाचा,
गा उठा नरकुल,
बँसवार भी ।
बज रही बाँसुरी
तुम भी सुनो, कृष्ण !
6
टूट के गिरी
एक और पंखुरी,
फूल बेबस ।
भौंरा भी लौट गया
गुनगुन करता ।
7
“दुनियावालो
!
मुझे भी तो जीने दो’’
पेड़ ने कहा ।
सुनता नहीं कोई,
हर कोई बहरा !
8
कब चेतोगे?
कटते जाते पेड़
दिन-पे-दिन,
बनती जाती पृथ्वी
पुनः आग का गोला !
9
बाग़ उजड़े,
उगी है बोनसाई
फ़्लॉवर-पॉट्
में ।
कोई बतलाओ भी,
कहाँ जाए चिड़िया ?
10
कुक् ! कुक्कुड़ू कूँ !!
कुक्कुट ने दी बाँग,
जगा औचक,
देखा, पाँच बजे थे,
पाँच जून भी आज ।
11
घर से दूर
हॉस्टल का जीवन
मेस का खाना,
रोटी का इन्तज़ार,
आ गई माँ
की याद !
12
गाँठ बाँधे है
इमली का चूरन
इमरतिया,
बँधा रही ढाँढस
मिचलाते मन को ।
13
गिरते बचा
मुँडेर पर काक
ढेला खाकर,
सँभला, उड़ चला
दे ही गया संदेशा !
14
एक्सीडेंट हुआ,
सिर से बहा ख़ून,
रुकी न कार,
उमड़ा फ़ुटपाथ,
बाक़ी है अभी जान ।
15
चाय पिलाए,
जूठे कप भी धोये
मन का सच्चा !
हमें भी बतलाना
ऐसा ही कोई बच्चा ।
मंगलवार, 21 दिसंबर 2021
1015
1-माहिया / अनिमा दास
1.
आकंठ तुम्हें गाऊँ
जब तक प्राण रहें
मैं तुमको ही चाहूँ।
2.
सुबह चली आती है
तुमसे मिलने की
क्यों प्यास जगाती है।
3.
संसार सुहाना है।
जो तुम साथ रहो
फिर क्या घबराना है।
4.
कैसी रजनी भाई
मन था सहमा- सा
याद मुझे थी आई।
5.
सूरज तुम , मैं वाणी
विस्तार करा दो
शिव तुम ,मैं शर्वाणी।
-0-
2-ताँका/ प्रीति अग्रवाल
1.
खोजते फिरे
हृदय छुपा
इक वहीं न झाँका
हर घर में ताका।
2.
नित नियम
जप, भोग, शृंगार
मानव चाल
दुगुने की चाहत
प्रभु पूजें, रिझाएँ!
3.
मेरा वियोग
वह सह न पाए
चाँद झट से
घटा में छुप जाए
उदासी नहीं भाए।
4.
मन मंथन
निशदिन करती
हाथ में आए
छाछ, केवल छाछ
माखन क्यों न आए?
5.
मन के द्वारे
राग द्वेष पसरे
प्रेम जो चाहे
कैसे प्रवेश पाए
विवश लौट जाए।
6.
माटी- सुगन्ध
तन मन घुलती
याद दिलाती
प्रियजन अपने
जाने किस हाल में!
7.
विरह- क्षण
घिर-घिर के आएँ
बड़ा सताएँ
भूलने की सुयुक्ति
कोई क्यों न सुझाए?
8.
कोरा कागज़
भर दिया मन का
नाम से तेरे
क्या तुम कुछ ऐसा
प्रियतम करते?
9.
न चिट्ठी- पत्री
न डाक, न डाकिया
दिन ये कैसे
इंतज़ार का लुत्फ़
न मिलन- बेचैनी।
10.
हिम के ढेर
नज़र जहाँ तक
सर्द हवाएँ
सुधियों की रजाई
सर्दी सता न पाई।
11.
खुद को कभी
अकेला न समझो
भीड़ का हिस्सा
होकर भी अकेले
होते बहुत लोग।
-0-
मंगलवार, 14 दिसंबर 2021
1014- प्राणप्रिया के लिए
प्राणप्रिया के लिए
रश्मि विभा त्रिपाठी
1
वे प्राणप्रिया
व्यथा का कोई ज्वर
व्यापे न उम्र भर
वरदहस्त
उनके शीश पर
धर दो महेश्वर।
2
जाह्नवी की- सी
ज्यों अविरल धार
झरे मोद अपार
प्राणप्रिया का
महेश दो सँवार
तुम मन- संसार।
3
आनन्दमना
उन्हें देख हर्षाऊँ
मैं बलिहारी जाऊँ
तुम्हारे द्वारे
शिव! झोली फैलाऊँ
तो ये आशीष पाऊँ।
4
हे गंगाधर!
तुम भक्तवत्सल
माँगूँ वर एकल
सदा प्रिया का
मन हो परिमल
खिलें सुख-उत्पल।
5
वे मेरी शक्ति
प्राण-मन आधार
मेरा जीवन-सार
प्रिया के हिय
शिव! करो अपार
सर्वसुख-संचार।
-0-