बुधवार, 9 जनवरी 2013

समय की अलकें


रामेश्वर काम्बोज हिमांशु
1
जीवन-रस
छनकरके बहा
बाकी क्या रहा-
केवल तलछ्ट,
ईर्ष्या , छल-कपट ।
2
जिएँगे कैसे
किश्तों में ये ज़िन्दगी ?
सौ अनुबन्ध
हज़ारों प्रतिबन्ध
फिर  ये तेरी कमी ।
3
भरी घुटन
विचलित मन
घुप्प अँधेरा
चुप्पी करती बातें
काटे न कटें रातें ।
4
तलाशे तुम्हें
यादों के बीहड़ में
खोज न पाएँ
खिंची ऐसी दीवारें
ढूँढ़ें -द्वार न मिला ।
5
सुलझी  नहीं
समय की अलकें
उलझी और
इनको जब -जब
हमने सुलझाया ।
6-
गहन रात
नभ का फैला ताल
लगाएँ गोता
अनगिन  थे तारे
ठिठुरते बेचारे ।
-0-

14 टिप्‍पणियां:

सहज साहित्य ने कहा…

बहुत आभार अनिता ललित जी !

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

जिएँगे कैसे
किश्तों में ये ज़िन्दगी ?
सौ अनुबन्ध
हज़ारों प्रतिबन्ध
फिर ये तेरी कमी ।

यूँ तो सभी एक से बढ़कर एक हैं ...
पर ये मेरे दर्द से मिलता -जुलता ....:))

Manju Gupta ने कहा…

जीवन के अनुभवों को सुंदर तांको में साहित्यिक धार से तराशा है . बधाई

Subhash Chandra Lakhera ने कहा…

इन सुन्दर रचनाओं के लिए हार्दिक अभिनन्दन !
- सुभाष लखेड़ा

KrishnaVerma ने कहा…

समस्त ताँका बहुत भावात्मक...बहुत बधाई।

Anita Lalit (अनिता ललित ) ने कहा…

क्षमा कीजिएगा भाई साहब ! मेरी संशोधित टिप्पणी में 'कोमल' शब्द छूट गया :(

~कोमल स्पर्श,
पर छिली हथेली,
दिल भी रोया,
समय की अलकें...
अकड़ीं, वक़्त संग...'

~सादर!!!

Rachana ने कहा…

तलाशे तुम्हें
यादों के बीहड़ में
खोज न पाएँ
खिंची ऐसी दीवारें
ढूँढ़ें -द्वार न मिला ।
sunder shabdon me dhala bhavon ka sagar
rachana

Dr.Bhawna ने कहा…

Jeevan ke utaar-chadhaav,bichhoha,prkrti ka jo khaaka aapne kheencha hai bahut prabhaavpurn hai...

जीवन-रस
छनकरके बहा
बाकी क्या रहा-
केवल तलछ्ट,
ईर्ष्या , छल-कपट ।
ye taankaa bahut kuch kah gaya ,satya ,spast...bahut2 badhai...

Dr.Bhawna ने कहा…

जीवन-रस
छनकरके बहा
बाकी क्या रहा-
केवल तलछ्ट,
ईर्ष्या , छल-कपट ।

Sabhi taanka apna2 alag mahatv rakhte hain,prkrti ka sundar chitran,risto ki soch,bhaav sabhi samaya hai inmen,ye taanka bahut bade sach ko ujagar karta hua hai...aapko hardik badhai,pata nahi pahli tippani kanha gayi.. :)

अनाम ने कहा…

सुन्दर--- बहुत भावात्मक ताँका
सुलझी नहीं

समय की अलकें

उलझी और

इनको जब -जब

हमने सुलझाया ।
बधाई।
Dr Saraswati Mathur

प्रियंका गुप्ता ने कहा…

जिएँगे कैसे
किश्तों में ये ज़िन्दगी ?
सौ अनुबन्ध
हज़ारों प्रतिबन्ध
फिर ये तेरी कमी ।
एक अनकही पीड़ा सी...जो दिल में उतरती है...।
सुलझी नहीं
समय की अलकें
उलझी और
इनको जब -जब
हमने सुलझाया ।
क्या बात है...।
सभी एक से बढ़ कर एक...बहुत बधाई...।
प्रियंका

डॉ. जेन्नी शबनम ने कहा…

सभी ताँका मन के बहुत करीब लगा और मन को छू गया...

जीवन-रस
छनकरके बहा
बाकी क्या रहा-
केवल तलछ्ट,
ईर्ष्या , छल-कपट ।

जिएँगे कैसे
किश्तों में ये ज़िन्दगी ?
सौ अनुबन्ध
हज़ारों प्रतिबन्ध
फिर ये तेरी कमी ।

सुलझी नहीं
समय की अलकें
उलझी और
इनको जब -जब
हमने सुलझाया ।

सभी अतुलनीय, शुभकामनाएँ.

ज्योत्स्ना शर्मा ने कहा…

मन के भावों को सुन्दरता से अभिव्यक्त करते ताँका ....
सुलझी नहीं
समय की अलकें
उलझी और
इनको जब -जब
हमने सुलझाया ।....बहुत मर्मस्पर्शी !
सादर नमन के साथ
ज्योत्स्ना

सहज साहित्य ने कहा…

सभी का हृदय से बहुत आभार