ताँका
डॉ अनीता कपूर
1
ये जो अपने
बनते हैं यूँ ख़ास
ओढ़े चादर
ऊपर से उजली
अंदर दागदार ।
2
चारों तरफ
उग आए है रिश्ते
गिरगिटों-से
संवेदनाओं-लदी
लताएँ मर रही ।
-0-
सेदोका
डॉ अनीता कपूर
1
बंदूकें हो या
कागज़ और स्याही
ईमान भयाक्रांत
देखके स्वार्थी
इरादों की शक्ल में
गोली व कलम को ।
2
अपना कद
गर लम्बा करते
मेरे कन्धे के बिना
तय है यह-
आज भी हमारे वो
रिश्ते रेशमी होते।
3
रिश्तों की घड़ी
आज भी दीवार पे
यूँ ही है सूनी खड़ी
स्वार्थी सुइयाँ
लम्हे समेट भागीं
घायल हुई घड़ी।
4
मानवीयता
बनी है कब्रगाह
घनघोर चुप्पी की
चादर ओढ़े
रिश्तों ने बेशर्मी के
टाँकें लगा दिये हैं
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