रचना श्रीवास्तव
रंगीन पंख
कोमल मन वाली
चिड़िया थी वो
उडती गगन पे
चोंच में भर
सूरज की किरणें
नित राह में
करती थी उजाला
लिखती कभी
सिन्धु की लहरों पे
वो अपना ही
नूतन इतिहास
बादलों पर
क़दमों के निशान
बनाती वह
चलती ही जाती ,
कोमल मन वाली
चिड़िया थी वो
उडती गगन पे
चोंच में भर
सूरज की किरणें
नित राह में
करती थी उजाला
लिखती कभी
सिन्धु की लहरों पे
वो अपना ही
नूतन इतिहास
बादलों पर
क़दमों के निशान
बनाती वह
चलती ही जाती ,
खलने लगी
गिद्धों को बहुत ही
उसकी ख़ुशी ,
उसकी ख़ुशी ,
एक दिन उसके
नोचे थे पंख थम गया समय
रोया बादल
नदियाँ चुप हुई
इस दर्द से
फटने लगी धरा,
छटपटाती
वो मासूम आ गिरी
धरती पर ,
बहुत देर चीखें
उसकी गूँजी
हुए घायल पंख
कभी उठते
कभी गिरते रहे
साँसे रोके थे
सुख-दु:ख के साक्षी
सूरज -चाँद
पर थे वे बेबस
चिड़िया चली
जीने की चाह लिये
उस दूर लोक को ।
पर थे वे बेबस
चिड़िया चली
जीने की चाह लिये
उस दूर लोक को ।


