सोमवार, 19 नवंबर 2012

सर्द मौसम-सेदोका


1
खरगोश- सी
दौड़ती पुरवाई
 खुशबू भर लाई
मौसम पर
 झूमती लहराई
सरदी बन आई ।
 2
 पाहुन बन
 सरदी थी उतरी
 परिणीता सी छूती
 पावन धरा
 फूलों को रंग कर
 तितली -सी उड़ती
 3
 सूर्य निकला
 दौड़ी गिलहरियाँ
 धूप के टुकड़ों की
 हरे पत्तों पे
 चहके पंछी संग
अँधेरों को चीरती
4
पाखी कुहुके
फिरकी सी घूमती
चली पुरवाई थी
 घोड़े सर्दी के
 दौड़ाती आई थी
 बर्फानी- सी पसरी
 5
 सर्द मौसम
 रस ओंठ खुले थे
 मधु पराग भरे
 नव कलिका
 फूल बन करके
 तितलियाँ बुलाती ।
 6
 नीलवर्ण है
 उन्मन- सी सरदी
उड़ी पंख फैलाए ,
 जैसे विहग
 धूप का ओढ़े शाल
 हवा के संग संग
--डॉ सरस्वती माथुर

4 टिप्‍पणियां:

अनाम ने कहा…

पाखी कुऊँके
फिरकी सी घूमती
चली पुरवाई थी
घोड़े सर्दी के
दौडाती आई थी
बर्फाती सी पसरी

Bahut Hee Khubsurat hain Sedoka !Badhaaee Mathur ji
Neena Deewan

प्रियंका गुप्ता ने कहा…

खरगोश- सी
दौड़ती पुरवाई
खुशबू भर लाई
मौसम पर
झूमती लहराई
सरदी बन आई ।
बहुत सुन्दर सेदोका...बधाई...।
प्रियंका

अनाम ने कहा…

बहुत ही काव्यात्मक सुन्दर सेदोका हैं सरस्वती जी अनुपम प्रस्तुति वाह .... मुबारक !

स्वाति

अनाम ने कहा…

"पाहुन बन
सरदी थी उतरी
परिणीता सी छूती
पावन धरा
फूलों को रंग कर
तितली -सी उड़ती!"

आप बहुत सुंदर एक कथानक कहते हुए लिखती हैं !
क्या आपका कोई संग्रह भी है?
इंदु